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आँखें खोलो गांधारी

Posted On: 28 Apr, 2013 में

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आँखें खोलो गांधारी
भयावह है-
यह ओढ़ा हुआ अँधेरा
दिशाहीन भटक रही
इसमें सन्तति तुम्हारी
आँखें खोलो गांधारी
निहारो अपने
नौनिहालों को
संभालो -
कि डगमगाते हैं
उनके कदम
आँखें खोलो गांधारी
ताकि उनको
बहका न सके
कोई शकुनि
ताकि कोई सुयोधन
न बने दुर्योधन
ताकि कोई सुशासन
बने नहीं दुःशासन
आँखें खोलो गांधारी
तेजस्वी है तुम्हारी दृष्टि
बाँहों में भर लो रोशनी
जगमगा दो अखिल समष्टि
तुम्हारी ही आँखें
दिखा सकती हैं -
अंधे धृतराष्ट्र को राह
खोल सकती हैं
अंध- हृदय की गाठें
कुंठित अंतस में
भर सकती हैं उछाह
आँखें खोलो गांधारी
हर लो
इस अंध- युग
की अन्धता
ताकि हो न सके
कोई चीरहरण
जीती रहे संवेदना
न मूल्यों का
हो क्षरण
आँखें खोलो गांधारी
तुम्हारी यह दीठ
पल भर में
देह को कर
सकती है वज्र
आँखें खोलो गांधारी
जगाओ युग चेतना
समग्र
लाक्षागृह का धुंवा
या अभिमन्यु की कराह हो
मत करो अनदेखा -
जब सुलगती डाह हो
आँखें खोलो गांधारी
रोक लो
संबंधों की महाभारत
ताकि
दांव पर न लगे
किसी द्रौपदी
की अस्मत
आँखें खोलो गांधारी
भयावह है-
यह ओढ़ा हुआ अँधेरा
धुंध में डूबी निशा
मांगे अब नया सवेरा

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33 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Xantara के द्वारा
October 17, 2016

Her full name is Lizzie Conch Shell Beetle Husk Bennett, but you can call her Conch for short. Related, this line made me snort coffee when I read it this morning before the sun came up and 15 hours later, it&;7218#s still funny.

pkdubey के द्वारा
December 26, 2014

अवश्य ही यदि ऐसा हो तो कोई महाभारत ही नहीं होगा ,सादर आभार आदरणीया |

    vinitashukla के द्वारा
    January 9, 2015

    धन्यवाद दुबे जी.

dineshaastik के द्वारा
November 20, 2013

आदरणीया विनीता जी, सादर। सुन्दर भावूपूर्ण रचना

    vinitashukla के द्वारा
    November 20, 2013

    बहुत बहुत धन्यवाद आ. दिनेश जी.

Sushma Gupta के द्वारा
June 14, 2013

आदरणीय विनीता जी नमस्कार, आज देश के सामने ,आजादी के इतने वर्षो बाद भी बहुत ही भयावय परिस्थियां उठ खड़ी हुई हैं, ऐसे अंधकारमय वातावरण में आपकी यह रचना मानो अन्धकार में प्रकाश-पुंज के सद्रश्य ही है,देश में उपजी अनेकानेक भीषण परिस्थियों का सामना जनता को अपनी आँखों व् सोच को खुली रखकर करना होगा, न कि गांधारी की भांति जान कर भी आँखें बंद करके …बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण रचना ,वधाई ..

    vinitashukla के द्वारा
    November 20, 2013

    आपका बहुत बहुत धन्यवाद

harirawat के द्वारा
June 14, 2013

विनीता जी किन शब्दों में आपको बधाई दूं, आपने गांधारी को मध्यस्थ बनाकर महाभारत के विशाल कुरुक्षेत्र को आज के शकुनियों, दुर्योधनों और दुशासनो के खूनी पंजों से जोड़ कर एक नए महाभारत की रचना करके आज की सहमी सिकुड़ी अलसाई, सोई हुई जनता को जगा दिया है ! उन्हें आभास करा दिया है की तुम्हारे ही बीच में शकुनी, दुर्योधन और दुशासन लाक्षा गृह, चीर हरण, की तैय्यारी में जुटे हुए हैं जाग जाओ, सजग हो जाओ गांधारी ! संदेशात्मक रचना, शाधुवाद ! अवसर मिले एक नजर जागते रहो की और फिरा देना !

    vinitashukla के द्वारा
    November 20, 2013

    कोटिशः धन्यवाद.

div81 के द्वारा
May 9, 2013

आदरणीया विनीता जी,  सादर प्रणाम धारदार रचना, मेरा भी यही मानना है गांधारी और धृतराष्ट्र बनना छोडना होगा अगर चाहते हो की घर में सुयोधन हो और समाज सभ्य बना रहे तो दुर्योधन बनने से रोकना होगा और ये शुरुवात हर घर से होनी जरुरी है .. अर्थपूर्ण रचना … बधाई

    vinitashukla के द्वारा
    May 10, 2013

    कोटिशः धन्यवाद, सराहना व समर्थन के लिए.

seemakanwal के द्वारा
May 4, 2013

आँखें खोलो गांधारी रोक लो संबंधों की महाभारत ताकि दांव पर न लगे किसी द्रौपदी की अस्मत बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना .इतनी सुन्दर रचना के लिए बहुत बहुत बधाई . धन्यवाद .

    vinitashukla के द्वारा
    May 5, 2013

    सराहना एवं उत्साहवर्धन हेतु धन्यवाद सीमा जी.

priti के द्वारा
May 4, 2013

आदरणीया विनीता जी ,बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण अभिव्यक्ति! हार्दिक बधाई!

    vinitashukla के द्वारा
    May 4, 2013

    हार्दिक आभार प्रीती जी.

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
May 3, 2013

आँखें खोलो गांधारी तेजस्वी है तुम्हारी दृष्टि बाँहों में भर लो रोशनी जगमगा दो अखिल समष्टि तुम्हारी ही आँखें दिखा सकती हैं – अंधे धृतराष्ट्र को राह खोल सकती हैं अंध- हृदय की गाठें आदरणीय विनीता जी बहुत सुन्दर आह्वान ..काश ऐसा ही हो आँखें खुलें लोगों को दिखाया जाए सुनाया जाए समझाया जाए और फिर सुयोधन दुर्योधन न बने तो आनंद और आये …सुन्दर रचना भ्रमर ५

    vinitashukla के द्वारा
    May 3, 2013

    रचना में निहित भाव को ग्रहण कर, सकारात्मक प्रतिक्रिया देने हेतु धन्यवाद भ्रमर जी.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
May 3, 2013

सुन्दर अवाहन सादर बधाई. आदरणीया विनीता जी

    vinitashukla के द्वारा
    May 3, 2013

    सराहना हेतु अनेकानेक धन्यवाद, आदरणीय कुशवाहा जी.

yogi sarswat के द्वारा
May 1, 2013

लाक्षागृह का धुंवा या अभिमन्यु की कराह हो मत करो अनदेखा – जब सुलगती डाह हो आँखें खोलो गांधारी रोक लो संबंधों की महाभारत ताकि दांव पर न लगे किसी द्रौपदी की अस्मत आँखें खोलो गांधारी आज कल के हालत पर इससे बढ़िया शब्द नहीं हो सकते आदरणीय विनीता शुक्ला जी ! बहुत बहुत सटीक और सुन्दर शब्द

    vinitashukla के द्वारा
    May 1, 2013

    समर्थन एवं सराहना के लिए धन्यवाद.

jlsingh के द्वारा
May 1, 2013

आदरणीय विनीता जी, सादर अभिवादन! बहुत ही सुन्दर भावयुक्त प्रभावी कविता!

    vinitashukla के द्वारा
    May 1, 2013

    बहुत बहुत धन्यवाद जवाहर जी.

yamunapathak के द्वारा
April 30, 2013

विनीता जी यह बहुत ही सुन्दर और प्रतीकात्मक कविता है. तुम्हारी ही आँखें दिखा सकती हैं – अंधे धृतराष्ट्र को राह साभार

    vinitashukla के द्वारा
    April 30, 2013

    सकारात्मक, उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद यमुना जी.

shashi bhushan के द्वारा
April 30, 2013

आदरणीय विनीता जी, सादर ! वाह ! बहुत सुन्दर ! अद्भुत भाव-सम्प्रेषण ! सचमुच अब समय आ गया है कि गांधारियां अपनी पट्टी खोलें और अपनी संतानों को समुचित मार्गदर्शन दें ! सादर !

    vinitashukla के द्वारा
    April 30, 2013

    सुंदर शब्दों में सराहना हेतु, कोटिशः धन्यवाद आदरणीय शशिभूषण जी.

nishamittal के द्वारा
April 28, 2013

विनीता जी बहुत समय पश्चात आपकी विचारोत्तेजक रचना पढ़ी.बहुत सुन्दर काश हर माँ अपनी तथाकथित आधुनिकता की चश्मे के समान पट्टी उतारकर अपनी संतान को सही दिशा में निर्दिष्ट करे.

    vinitashukla के द्वारा
    April 28, 2013

    अनेकानेक धन्यवाद निशा जी.

alkargupta1 के द्वारा
April 28, 2013

विनीता जी , वर्तमान समयानुकूल जन-जनकी चेतना को जागृत करने वाली आपकी गुहार काश सुदूर तक सुनाई पड़े …..हर गांधारी की आँखें खुलें और नया सवेरा हो …….. “ दांव पर न लगे किसी द्रौपदी की अस्मत आँखें खोलो गांधारी भयावह है- यह ओढ़ा हुआ अँधेरा धुंध में डूबी निशा मांगे अब नया सवेरा!” अर्थपूर्ण विचारणीय श्रेष्ठ भावाभिव्यक्ति

    vinitashukla के द्वारा
    April 28, 2013

    कोटिशः आभार अलका जी.

bhagwanbabu के द्वारा
April 28, 2013

सही कहा आपने हर घर मे है गान्धारी खोलनी होगी उसे अपनी आँखें बहुत हो चुका अब कोलाहल खोलकर अपनी आँखें मासूमो को वज्र बनाना होगा . लेकिन समस्या है कुछ .. इस कविता मे पढ़िये … http://bhagwanbabu.jagranjunction.com/2013/04/27/%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A5%80-%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A5%80-%E0%A4%AC%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80/

    vinitashukla के द्वारा
    April 28, 2013

    रचना को समर्थन प्रदान करने हेतु धन्यवाद.


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