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यौन शिक्षा की आवश्यकता- जागरण जंक्शन फोरम

Posted On: 20 Feb, 2013 में

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क्या सेक्स- एजुकेशन, यौन अपराधों पर लगाम कस सकती है?
उत्तर है -हाँ पर एक हद तक. सेक्स -एजुकेशन की सबसे ज्यादा जरूरत, कम उम्र के मासूम बच्चों को है. किशोरों को तो उनके दैहिक परिवर्तन ही, बिना कुछ कहे; बहुत कुछ सिखा देते हैं. इन्टरनेट की ‘बदौलत’, समय से पहले ‘ सब कुछ’ सीखने को मिल रहा है- उनमें से बहुतों को. ऐसों के लिए, कैसी एजुकेशन?! अबोध बालकों के लिए यह बेहद जरूरी है. ३-४ साल का होते ही किसी न किसी रूप में, उन्हें विकृत मानसिकता के लोगों से सावधान करना चाहिए. चौकलेट या अन्य किसी लालच में पड़कर, अजनबी लोगों के साथ जाने से रोकना चाहिए. आजकल जगह जगह (अस्पताल के शिशु वार्डों या फिर बच्चों के अखबार में) यह सावधानियां चार्ट के रूप में शब्दांकित/ चित्रांकित की गयी हैं. इनमें ‘अच्छे स्पर्श’ एवं ‘बुरे स्पर्श’ का भेद, यौन -दुर्व्यवहार के लिए ‘ना’ कहने की आवश्यकता( भले ही दुर्व्यवहार करने वाला कितना भी करीबी क्यों न हो) मुख्य हैं. किन्तु इतने छोटे बच्चों को शिक्षित करना, तलवार की धार पर चलने जैसा है. गलत ढंग से दी गयी जानकारी या जरूरत से ज्यादा एक्सपोज़र, उनमें यौन विकृतियाँ/ यौन कुंठाएं पैदा कर सकता है.
रही बात औरतों के प्रति दुर्व्यवहार की तो इसका प्रमुख कारण यौन- उत्तेजना नहीं वरन उन्हें कमतर समझने के गलत संस्कार हैं. मनुष्य यौन- उत्तेजना पर तो एक बार काबू पा सकता है क्योंकि प्रकृति ने उसे जानवरों से श्रेष्ठ बनाया है किन्तु जन्मजन्मान्तरों से चले आ रहे, पुरुष के, तुच्छ अहंकार को पोषित करने वाले संस्कारों पर नहीं !!!कारण – संस्कारों की जड़ें, बहुत गहरी होती हैं. उनसे उपजी मनोवृत्ति,यूं ही पीछा नहीं छोड़ती. ऐसे में सेक्स- एजुकेशन का तब तक कोई औचित्य नहीं जब तक बालक बचपन से ही, स्त्री का आदर करना नहीं सीखते. समस्या का हल हमारे परिवारों में ही है:
१- परिवार के लड़कों को दूध- फल आदि का जितना पोषण मिलता है- उतना ही लड़कियों को भी मिले.
२- लडकियों को शिक्षा के समान अवसर दिए जाएँ.
३- आचरण का पाठ, लड़कियों के साथ साथ, लड़कों को भी पढाया जाए (क्योंकि परिवार की मर्यादा बनाये रखने की, जिम्मेदारी उनकी भी है)
इन बातों का पालन होने से, कुटुंब के लड़के, अपनी बहनों का आदर करना सीखेंगे.
इसके साथ ही-
१- हर पति को चाहिए कि जब उसकी पत्नी, बेटे को किसी गलत बात के लिए टोकती है तो वह पत्नी का साथ दे ( न कि उसे डांटकर चुप करवाए).
२- हर माँ को चाहिए कि वह अपने बेटे के साथ स्वस्थ, दोस्ताना सम्बन्ध बनाये और उसे भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करे (ताकि बेटे के कदम बहकने पर, वह उनकी आहट, सहज ही सुन सके.)
इन बातों का पालन होने पर, कुटुंब के लड़के, अपनी माँ का आदर करना सीखेंगे
साथ ही साथ, समाज की मानसिकता भी बदलने की जरूरत है:
१- बेटी के माँ- बाप उसे विवाह करके ‘निपटाने’ में ही अपने कर्तव्य की इतिश्री न समझें. यदि बेटा बुढ़ापे की लाठी बन सकता है तो बेटी क्यों नहीं?
२- आचरणहीन स्त्री के साथ साथ, आचरणहीन पुरुष का भी सामाजिक बहिष्कार हो.
इन बातों का पालन होने से, समाज में, औरतों की हैसियत, मजबूत होगी.
अब मूल विषय पर आयें. बीस साल पहले की घटना, याद आ रही है जब मैं सेंट फ्रांसिस, अनपरा में, विज्ञान की अध्यापिका के तौर पर, काम कर रही थी. कक्षा पांच से लेकर, दस तक के बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी थी. बच्चों की अतिरिक्त जिज्ञासाओं का समाधान करने हेतु ‘एक्स्ट्रा क्लास’ लेने लगी. उसी दौरान कक्षा पांच के एक बच्चे ने ( जिसकी उम्र मुश्किल से दस साल होगी) एक विचित्र और बेढंगा सवाल पूछा, “टीचर, चमगादड़ तो हरदम उलटा लटकता रहता है, फिर वह बच्चा कैसे देता है? उसका बच्चा जमीन पर गिरता नहीं?” इस सवाल पर, पूरी क्लास हंसने लगी. सवाल के जवाब में, दूसरे बच्चे ने उठकर कहा, ” वह पहले ही ‘बकेट’ लगा देता होगा. यह सुनकर, पुनः एक हंसी की लहर दौड़ गयी. मेरी दशा बहुत अटपटी हो गयी थी. मन संकोच से भर उठा. इस बात पर हंस भी नहीं सकती थी क्योंकि इससे, एक गलत प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता. डांटना भी संभव न था क्योंकि ऐसा करने से, बेवजह, वह मुद्दा ‘हाईलाइट’ हो जाता. सवाल पूछने वाला बच्चा उस कक्षा में प्रथम आता था और जवाब देने वाला द्वितीय. किसी प्रकार उस प्रश्न को टाला और घबराकर ‘एक्स्ट्रा क्लास’ बंद कर दी.
सामान्य ज्ञान की अध्यापिका ने भी बताया कि जब उसने ‘एड्स’ का फुल फॉर्म पूछा तो अपना ज्ञान बघारने की गरज से उसी क्लास की एक छोटी सी बच्ची ने, यौन संबंधों में सावधानी बरतने हेतु , प्रयुक्त होने वाले, ‘साधन’ का नाम लिया. बच्ची के हाव- भाव से स्पष्ट था कि वो इस बारे में कुछ नहीं जानती थी.
इन दोनों घटनाओं से पता चलता है कि अधकचरी जानकारी, बच्चों को किस तरह नुकसान, पहुंचा सकती है. यह भी कि यौन शिक्षा देना कोई आसान काम नहीं है. हालांकि मैंने पहले यह कहा कि यौन उत्तेजना, यौन अपराधों को बढ़ावा देने वाला प्रमुख कारण नहीं है; किन्तु फिर भी वह एक बेहद अहम कारक( स्ट्रोंग फैक्टर) है. इसे काबू करने के लिए जरूरी है-
१- हर मां बाप बच्चे को, गरिमामय व्यवहार करने एवं गरिमामय परिधान धारण करने की प्रेरणा दें.
२- अश्लील साहित्य पढने पर रोक और इन्टरनेट के प्रयोग पर लगाम लगायें.
३- बच्चे पर नजर रखें कि वह किस तरह के साथियों से घुल – मिल रहा है/ कौन सा टी वी सीरियल देख रहा है.
४- बच्चे की यौन जिज्ञासाओं का संतुलित एवं परिपक्व तरीके से समाधान करें.
यह बात भी दीगर है कि पुराने जमाने में, जब यौन जिज्ञासाएं कम उम्र में ही शांत हो जाती थीं ( बाल विवाह के चलते) तब भी यौन अपराध होते थे( भले ही चोरी छिपे). कहने का तात्पर्य ये है कि इस प्रकार के अपराधों को रोकने के लिए, केवल शिक्षा ही काफी नहीं; बल्कि सामाजिक- सोच में, आमूल- चूल परिवर्तन की भी आवश्यकता है.

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48 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Darrance के द्वारा
October 17, 2016

It amazes me that you can quote a 4.7% saving available to renewing customers. You have increased the standing charge for existing fixed tariff customers by 33oid%mb(nec), Electricity by 6.1% and Gas by 3.32%. Which ever way you try to gift wrap it it is still going to equate to an increase of 8.1% if I fix for next year,not the 4.7% quoted in your press release. Please could someone clarify your calculations?

anabolism definition के द्वारा
October 19, 2013

vinitashukla.jagranjunction.com मैंने देखा है और अधिक प्रभावशाली ब्लॉगों की एक एक है . धन्यवाद एक बदलाव के लिए इंटरनेट उत्तम दर्जे रखने के लिए इतना . Youve शैली , वर्ग , वाहवाही मिली. मैं यह मतलब है. इंटरनेट के बिना निश्चित रूप से खुफिया में कमी है क्योंकि यह ऊपर रखें.

Madan Mohan saxena के द्वारा
April 10, 2013

बहुत सुंदर …बेह्तरीन अभिव्यक्ति …!!शुभकामनायें. आपका ब्लॉग देखा मैने और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

    vinitashukla के द्वारा
    April 11, 2013

    उत्साहवर्धन हेतु आभार मदन मोहन जी.

mayankkumar के द्वारा
April 2, 2013

बेहद साफगोई से आपने शिक्षा का महत्‍व बयां किया हैा वाकई नई पीढी को नए सिरे से मजबूत करने की जरूरत है, जो शिक्षा की कसौटी पर ही संभव है। धन्‍यवाद, हमारे ब्‍लॉग पर भी पधारें ।

    vinitashukla के द्वारा
    April 11, 2013

    अनेकानेक धन्यवाद.

deepasingh के द्वारा
March 2, 2013

आदरणीया माता पिता का कर्त्तव्य है की अपने बच्चों पर नज़र रखे की काहीं वो गलत आदतों में तो नही पद रहे. सही कहा आपने. वन्देमातरम.

    vinitashukla के द्वारा
    March 5, 2013

    धन्यवाद दीपा जी, समर्थन प्रदान करने हेतु.

bhagwanbabu के द्वारा
February 25, 2013

विनिता जी मेरे इस लेख को पढ़्कर बताये…. शायद आपके लेख पर प्रतिक्रिया क्या हो… पता चल जायेगा… http://bhagwanbabu.jagranjunction.com/2013/02/22/सेक्स-से-खिलवाड़-–-jagran-junction-forum/

    vinitashukla के द्वारा
    February 25, 2013

    जी हाँ आपका लेख जरूर पढूंगी.

aman kumar के द्वारा
February 25, 2013

आदरणीया विनीता जी सादर प्रणाम | आपका लेखन सही दिशा मे है | इस प्रकार के अपराधों को रोकने के लिए, केवल शिक्षा ही काफी नहीं; बल्कि सामाजिक- सोच में, आमूल- चूल परिवर्तन की भी आवश्यकता है.

    vinitashukla के द्वारा
    February 25, 2013

    अमन जी, रचना को पढ़कर, सहमति देने हेतु धन्यवाद.

SATYA SHEEL AGRAWAL के द्वारा
February 24, 2013

विनीता जी, आपकी सभी बातों का पूर्णतयः समर्थन करता हूँ ,ज्ञान वर्द्धक लेख

    vinitashukla के द्वारा
    February 24, 2013

    बहुत बहुत धन्यवाद आपका.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
February 24, 2013

आचरण का पाठ, लड़कियों के साथ साथ, लड़कों को भी पढाया जाए (क्योंकि परिवार की मर्यादा बनाये रखने की, जिम्मेदारी उनकी भी है सार्थक लेख हेतु बधाई, इसका अनुपालन लाभ कर होगा आदरणीया विनीता जी सादर

    vinitashukla के द्वारा
    February 24, 2013

    रचना में निहित विचारों को, समर्थन प्रदान करने हेतु आभार आदरणीय कुशवाहा जी.

alkargupta1 के द्वारा
February 23, 2013

विनीता जी , अति गंभीर व संवेदनशील विषय पर लिखा है ….. विचारणीय आलेख

    vinitashukla के द्वारा
    February 23, 2013

    रचना को समय देने एवं सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु आभार अलका जी.

akraktale के द्वारा
February 23, 2013

आदरेया विनीता जी आपके इस आलेख में कई बातें ऐसी प्रतीत हो रही है जैसे रट्टा लगा रखा हो और कुछ बातें अव्यवहारिक सी प्रतीत हुई. कुछ कुछ बातों से आलेख कमजोर हुआ है. मैं इस बात से पूर्ण सहमत हूँ की यह तलवार की धार पर चलने वाला कृत्य सामान है किन्तु जब बच्चा मुश्किल में हो तब माताएं शेर से भी लड़ जाती हैं. तो इस धार पर चलने का समय आ गया है तो फिर डरने से भी काम नहीं चलेगा. आवश्यक है शाला में इसे शुरू करने के पहले बच्चों के अभिभावाको को लगातार कई कार्यशाला आयोजित कर विश्वास में लिया जाए ताकि वे भी घर में मदतगार साबित हों तभी इसे शालाओं में लागू किया जाए. मैंने आलेख पर जैसा महसूस किया वही लिखा है मेरा तनिक भी विचार आपको आहत करने का नहीं है. सादर.

    vinitashukla के द्वारा
    February 23, 2013

    अशोक जी, सर्वप्रथम तो मेरे आलेख को समय देने के लिए धन्यवाद. जैसा कि आपने कहा, यह सच है कि अभिभावकों और अध्यापकों के आपसी तालमेल से ही, बच्चों में जागरूकता संभव है किन्तु यह स्पष्ट नहीं हुआ कि आलेख को कमजोर/ अव्यवहारिक बनाने वाले बिंदु कौन- कौन से हैं.

Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
February 23, 2013

आदरणीय, यह विषय साधारण विषय नहीं है अगर विचार किया जाये तो आज की यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा है और इन समस्याओं का हल काफ़ी हद तक एक परिवार के हाथ में है | आपने जागरूकता की ओर जिन समस्यों का हाल दिया है वह निश्चित ही यौन अपराधों को रोक सकती है |

    vinitashukla के द्वारा
    February 23, 2013

    विचारात्मक समर्थन के लिए, आभार धवलिमा जी.

    vinitashukla के द्वारा
    February 23, 2013

    सहमति और सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद शालिनी जी.

shashibhushan1959 के द्वारा
February 22, 2013

आदरणीय विनीता जी, सादर ! आदरणीय शाही जी के विचारों से मैं भी सहमत हूँ ! जरुरत नैतिक शिक्षा की है ! सेक्स की जानकारी उम्र के साथ-साथ स्वतः प्राप्त होती जाती है ! बहुत सी दैहिक, पारिवारिक और सामाजिक आवश्यकताएं ऐसी होती हैं, जिनमें गोपनीयता जरुरी है ! उस गोपनीयता को बरकरार रखना चाहिए ! इसकी जिम्मेदारी परिवार, हमउम्र मित्र और बौद्धिक परिपक्वता पर छोडनी चाहिए ! सतर्कता आवश्यक है, पर इतना नहीं की हम इस सजगता के पीछे नींद लेना ही छोड़ दें ! आपके सुझाव बहुत अच्छे और अनुकरणीय है ! हार्दिक बधाई !

    vinitashukla के द्वारा
    February 22, 2013

    आपने सही कहा, आदरणीय शशिभूषण जी; हमारे समाज के लिए, खुलेपन की प्रवृत्ति घातक है. मर्यादा की सीमाओं में रहकर ही, आचरण करना चाहिए. आलेख में दिए गये सुझाव आपको अच्छे लगे- इस हेतु हार्दिक आभार.

आर.एन. शाही के द्वारा
February 22, 2013

श्रद्धेया विनीता जी, आपने वस्तु-स्थिति के सापेक्ष अपेक्षित आचरण का बिन्दुवार विश्लेषण करने का अच्छा प्रयास किया है, परन्तु यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि आप यौन-शिक्षा की कितनी हिमायती हैं, अथवा नहीं हैं । सांकेतिक रूप से आपने अपना मंतव्य ज़ाहिर किया है कि हमारे संस्कार हमारे यहाँ यौन शिक्षा को आसान नहीं बनने देंगे । यही सही भी है । उदाहरण-स्वरूप कहना चाहूँगा, कि इस मंच पर प्राय: सभी महिला ब्लागर अच्छे पढ़े-लिखे एवं आधुनिक परिवेश में रहने वाले परिवारों से ताल्लुक़ रखती हैं, परन्तु अमूमन यहाँ सेक्स जैसे विषय पर किसी भी स्तर की चर्चा करने की प्रवृत्ति शायद ही अबतक किसी महिला में देखी गई हो । मैं छद्मवेशी महिलाओं की बात नहीं कर रहा हूँ । जबकि यदि यही साइट पश्चिमी समाज की होती, तो खुली बहस देखी जा सकती थी । हमारे यहाँ सेक्स-एजूकेशन से अधिक आवश्यकता नैतिक शिक्षा की है, ताक़ि हमारी पीढ़ियाँ संचार-माध्यमों द्वारा लाई गई अप-सांस्कृतिक प्रवृत्तियों पर विजय पाने में सक्षम हो सकें । धन्यवाद !

    vinitashukla के द्वारा
    February 22, 2013

    आदरणीय शाही जी. प्रणाम. सर्वप्रथम तो मेरे प्रयास को सराहने हेतु धन्यवाद. जैसा कि मैंने कहा, छोटे बच्चों का इस विषय में मार्गदर्शन बेहद जरूरी है. किशोरों को भी दैहिक परिवर्तनों से कुंठा हो सकती है और उन्हें भी मार्गदर्शन की आवश्यकता पड़ सकती है. किन्तु मैं इसे पाठ्यक्रम में लागू करने के पक्ष में बिलकुल नहीं हूँ( अध्यापक और शिष्य के बीच संवाद की गरिमा बेहद जरूरी है) यह मैंने उदाहरणों द्वारा, सांकेतिक रूप में कहा भी. यह मार्गदर्शन अभिभावकों( किशोरियों हेतु बड़ी बहन या माँ के द्वारा) दिया जा सकता है. जरूरत पड़ने पर काउन्सलिंग भी मददगार हो सकती है. आपने सच कहा कि हम महिला ब्लॉगरों के लिए, अभिव्यक्ति की सीमायें है. ऐसे विषयों पर बहुत खुलेपन के साथ, हम अपने विचार नहीं रख सकतीं. फिर भी जागरूक नागरिक की नैतिक जिम्मेदारी हम पर है इसलिए सामाजिक सरोकारों के साथ कहीं न कहीं जुड़ना जरूरी होता है( भले ही अप्रत्यक्ष रूप में). रचना को समय देने के लिए पुनः धन्यवाद. सादर

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 23, 2013

    अपने अभिप्राय को स्पष्ट करने के लिये मुझे बहस थोड़ी खींचनी पड़ रही है, क्षमा चाहूँगा । मैं कवि भूषण जी के उद्धरण का सहयोग लेते हुए उन्हें दोहराना भी चाहूँगा, कि ‘सेक्स की जानकारी उम्र के साथ स्वत: प्राप्त होती जाती है’ । जब यह एक प्राकृतिक आवश्यकता और प्रक्रिया दोनों ही श्रेणियों में आता है, तब फ़िर बच्चे हों या किशोर, कैसी कुंठा और क्या मार्गदर्शन ? सब कुछ तो आदिकाल से ही यूँ ही चला आ रहा है । प्रथम बार रजस्वला होने पर वय:संधि की बाला की स्वाभाविक घबराहट को क्या हम कुंठा की श्रेणी में रख दें ? ऐसी स्थिति में हर माता हमेशा से ही एक स्वाभाविक सखी की भूमिका निभाती आई है । क्या इसके लिये कभी स्कूली प्रशिक्षण की भी आवश्यकता महसूस की गई ? ऐसा ही प्रथम प्रसूता के साथ भी होता रहा है । जवानी की दहलीज़ पर खड़े जिज्ञासु बालक अपनी मंडली में ही चर्चा कर खुद ब खुद परिवर्तनों का सबब जान लेते हैं, आजतक कभी किसी को प्रशिक्षित करने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई, तो आज इतने विकसित और तथाकथित सभ्य समाज को ही इस शिक्षा की आवश्यकता क्यों महसूस होने लगी ? यदि मैं इसके पीछे विश्वव्यापी बाज़ारवाद के षड्यन्त्र की सम्भावनाओं पर चर्चा करने लगूँ, तो यह खिंचाई और लम्बी होती चली जाएगी । संक्षेप में कहना चाहूँगा कि भारतीय समाज कृपया कंडोम, वियाग्रा और गर्भनिरोधक बेचने वाले अन्तर्राष्ट्रीय गिरोह के झाँसों में आकर खुद को दूरगामी दुष्चक्र से दूर ही रखे तो अच्छा है । हमारे यहाँ यौन शिक्षा की कोई आवश्यकता नहीं है । यदि हमारे बच्चों को यौन-शिक्षा की आवश्यकता है, तो उनसे पूर्व हमारे पशु-पक्षियों को इस दिशा में प्रशिक्षित करना अधिक आवश्यक होगा, जिन्होंने कभी भी हमारी सामाजिक वर्जनाओं की कोई परवाह नहीं की । यह ऐसी क्रिया है, जो स्वत:स्फ़ूर्त निस्तारित होती है । बिना वजह इसपर जितनी माथापच्ची होगी, कुंठा निकलने के बजाय बढ़ती ही जाएगी । धन्यवाद !

    vinitashukla के द्वारा
    February 23, 2013

    आदरणीय शाही जी, आपकी बात दुरुस्त है. कायदे से तो परिवार के भीतर ही ऐसी समस्याओं का समाधान होना चाहिए – इन बातों का ढोल पीटना अच्छा नहीं लगता; यही हमारी पारिवारिक, सामाजिक – मर्यादा का तकाज़ा भी है. किन्तु कुछ मामलों में हमारा परम्परावादी/conservative होना भारी पड जाता है. अभी भी परिवारों में ऐसी चर्चा करना बुरा माना जाता है. खासतौर पर बड़ों का सम्मान करने की जो बात सिखाई जाती है – उसमें यह सावधानी शामिल नहीं होती कि सभी बड़े सम्मान के काबिल नहीं होते. फलस्वरूप करीबी रिश्तेदारों, पारिवारिक मित्रों और परिचितों द्वारा बाल- शोषण का ख़तरा बना रहता है. हाल में ही ‘सावधान इंडिया’ नामक सीरियल में एक मेधावी बालक का पी. टी. टीचर द्वारा शोषण दिखाया जा रहा था; मामले को दबाने में मैथ्स टीचर का भी हाथ था. यह सब एक नामी स्कूल में हो रहा था. देखकर बहुत धक्का लगा. समझ नहीं आता कि ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए क्या किया जाये? क्या हमें अपने परम्परावादी खोल से बाहर निकलना होगा या फिर सरकार को ऐसे साहित्य/ फिल्मों को सुलभ कराना होगा; जिससे बच्चे बिना कहे सावधान हो सकें. हमारी सामाजिक परिस्थियां किशोरियों के लिए बहुत अच्छी नहीं हैं. उन्हें अक्सर बुरी निगाहों/ व्यवहार का सामना करना पड़ता है. ऐसी बातों का समाधान न होने पर वह कुंठा में बदल सकती है. चर्चा में अपने विचार रखने के लिए शुक्रिया.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 25, 2013

    नैतिक शिक्षा ही इससे जुड़ी हर समस्या का समाधान है विनीता जी, और कोई उपाय नहीं है । एक दूसरे के भूखंडों पर समा चुकी दुनिया के मिश्रित संस्कारों से दामन बचाकर निकल पाना आज के दौर में किसी भी समाज के लिये संभव नहीं रह गया है । बाज़ारवाद हमारी रग-रग पर कब्ज़ा जमाता चला जा रहा है । पहले सादा जीवन उच्च विचार को आमतौर पर हर स्तर पर सम्मान प्राप्त होता था, जबकि आज का प्रमुख मापदंड व्यक्ति की जेब का वज़न और उसकी गाड़ी का माडल बन चुका है । नैतिकता की बात चर्चाओं में स्थान बनाती है, परन्तु व्यावहारिक रूप से लुप्तप्राय है । नई पीढ़ी को सही मार्ग दिखाने वाले विरले लोग प्रशासनिक स्तर पर बुरी तरह प्रताड़ित और उपेक्षित होते जा रहे हैं, क्योंकि सत्ता कोई भी हो, उसका चरित्र भ्रष्ट हो चुका है । शैक्षणिक सामग्री राजनीतिक आवश्यकताओं के आधार पर निर्धारित होने लगी है । ऐसे में आपसी मानवीय सम्बन्धों के बीच हम किसी मर्यादा की आशा करें भी तो कैसे ? सेक्स प्राकृतिक रूप से पाशविक आचरण ही है, जिसे मात्र मानव जाति द्वारा अपनी सामाजिक ज़रूरतों के आधार पर परिष्कृत कर मर्यादा के दायरे में ढाला गया है । वैज्ञानिक रूप से मानव सामाजिक ‘पशु’ ही तो है । नैतिकता का जैसे-जैसे विघटन हो रहा है, उसी अनुपात में समाज का भी विघटन हो रहा है, और प्रत्येक समूह अब एक भीड़ मात्र बनता जा रहा है । नई पीढ़ी के लिये भी हम खुद अपने हाथों से स्वच्छंद और निरंकुश व्यवस्था गढ़ने को लाचार हैं, क्योंकि आज के समय की मांग ही ऐसी है । मैं नैतिक शिक्षा की बात तो कर रहा हूँ, परन्तु खुद मुझे ही संदेह है कि इतनी दूर निकल आने के बाद हम लौटकर क्या समाज को वास्तव में ऐसी कोई शिक्षा व्यवस्था दे पाने में सक्षम भी हो पाएंगे ? ले-देकर हमारे पास अपने दम तोड़ते संस्कारों की पूँजी ही शेष है, जो कुछ उम्मीद जगा सकती है, शेष तो समय बड़ी तेज़ी से हमारे हाथ से फ़िसलता जा रहा है । आप शिक्षण क्षेत्र से जुड़ी विदुषी महिला हैं, अत: आपका आकलन ठीक ही होगा । धन्यवाद !

    vinitashukla के द्वारा
    February 25, 2013

    आदरणीय शाही जी, वर्तमान परिप्रेक्ष्य में विखंडित होते हुए नैतिक चरित्र की, यहाँ आपने बहुत सुन्दर विवेचना की. आपने सही कहा कि नैतिकता और आदर्शों के हिमायती लोगों को दबाया कुचला जा रहा है. शिक्षा में पाठ्यक्रम, राजनैतिक आवश्यकताओं के अनुरूप तोड़ा मरोड़ा जा रहा है. कहने को तो हम अखंड भारत के नागरिक हैं पर हमारी सोच जाति, धर्म और क्षेत्रवाद के दायरों में बंटकर, वोट – बैंक के समीकरण निर्धारित करती है. ऐसे में हम बच्चों को किस आदर्श, किन मूल्यों की शिक्षा दे पाएंगे? आपने सही कहा कि हम बाजारवाद के षड्यंत्र में फंसकर इतने आगे निकल आये हैं जहां से लौट पाना संदेहास्पद है. आपके बहुमूल्य विचारों के लिए, हार्दिक आभार.

    shashi bhushan के द्वारा
    February 25, 2013

    आदरणीय विनीता जी एवं आदरणीय शाही जी, आप ने जो कहा है कि ” नई पीढ़ी के लिये भी हम खुद अपने हाथों से स्वच्छंद और निरंकुश व्यवस्था गढ़ने को “लाचार” हैं, क्योंकि आज के समय की मांग ही ऐसी है ।” पर इस मांग को संवर्धित किसने किया है ? अंतर्राष्ट्रीय बाजारवाद के दलालों ने और हमारे मूर्ख-अदूरदर्शी राजनेताओं ने ! और बात जहां तक बहुत दूर निकल आने की है, तो अभी हमने कोई दूरी नहीं तय की है ! और तय भी की है तो वहाँ से वापस भी लौटा जा सकता है ! हमारा देश बहुत विशाल है और पाश्चात्य अघ्नंगी संस्कृति अभी उसे बहुत कम प्रभावित कर पाई है ! अगर ऐसा नहीं होता तो इस महाकुम्भ में एक ही दिन चार करोड़ लोगों की श्रद्धा उछालें न मारतीं ! सैकड़ों घायलों और कई मौतों के बाद भी इस श्रद्धा भावना की अनुगूंज समाप्त नहीं हुई ! अभी कोई नुक्सान नहीं हुआ है ! अभी भी हम चाहें तो स्थितियां काबू में आ सकती हैं, पर यह हमारे और आपके किये नहीं हो सकता, बल्कि इसके लिए सुदृढ़ इच्छा शक्ति वाला राजनैतिक परिवेश चाहिए !

    vinitashukla के द्वारा
    February 25, 2013

    आदरणीय शशिभूषण जी, आपका सकारात्मक दृष्टिकोण अच्छा लगा. काश कि हमें कोई ऐसा कुशल नेतृत्व मिल सके; जो संस्कारों को दूषित करने वाले कारकों का, उन्मूलन करने में सक्षम हो!

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 28, 2013

    आपने बड़े आशाजनक उदाहरण के माध्यम से अपना पक्ष रखने का प्रयास किया है कविवर । मैं भी तो अपने दम तोड़ते संस्कारों की पूँजी पर ही भरोसा व्यक्त कर पा रहा हूँ । हमारे संस्कार ही हैं जो कुम्भ तक ले जाते हैं । परन्तु एक सच्चाई यह भी है कि एक दो दशक बाद कुम्भ के महामेले वाली भीड़ रिटायर्ड होकर तेजी से छाते आज की युवा आबादी की ओर ही आशा भरी नज़रों से देख रही होगी, कि वे संस्कारों का झंडा ऊँचा उठाए रखें । क्या आपको लगता है कि यौनशिक्षा ग्रहण करने वाली पीढ़ी भी इस ग्राफ़ को बनाए रख पाएगी ? आज उसी मीडिया का वर्चस्व समाज पर हाबी है, जिसके कारण हम कुम्भ से संतों के बहुमूल्य प्रवचन का सीधा रसास्वादन कर पा रहे हैं, तथा माता वैष्णो की पवित्र पिंडियों का नित्यप्रति अपने घर में बैठे-बैठे ही दर्शन कर पा रहे हैं । देखना होगा कि भविष्य में भी बाज़ारवाद हमें यह अवसर सुलभ कराते रहता है, अथवा नहीं । जिनके ऊपर नैतिकता की शिक्षा-व्यवस्था का दारोम्मदार है, जब वही बे-ईमान बन चुके हैं, तो किसके सहारे हम उम्मीदों का दीप प्रज्वलित रख पाएंगे ?

surendra shukl bhramar5 के द्वारा
February 20, 2013

आदरणीया विनीता जी बहुत सुन्दर विन्दुओं पर आप ने प्रकाश डाला विचारणीय आलेख है इन में से बहुत से कारणों पर निश्चित ही गौर फरमाना चाहिए हाँ अपवाद तो है ही बच्चे तो बच्चे ही हैं बड़े उत्सुक होते हैं बिना बताये ही आज कल मीडिया का प्रसाद व् कुछ बहके लोगों के सानिध्य में आ बड़े तेज हैं अब हम उन्हें और सिखाएं तो वे और न जाने कितने तेज हो जायेंगे और न जाने और क्या क्या करने सीखने पढने लगेंगे हाँ सिखाने वाला बहुत कुशल नाविक सा हो तो नाव सही दिशा में जायेगी डूबेगी नहीं …… जय श्री राधे भ्रमर ५

    vinitashukla के द्वारा
    February 21, 2013

    इस सकारात्मक, विचारशील प्रतिक्रिया के लिए कोटिशः धन्यवाद भ्रमर जी.

seemakanwal के द्वारा
February 20, 2013

विनीता जी आप की बात से पूरी तरह सहमत की शिक्षा के साथ साथ सोच में भी परिवर्तन की जरूरत है . हार्दिक धन्यवाद .

    vinitashukla के द्वारा
    February 20, 2013

    बहुत बहुत धन्यवाद सीमा जी, समर्थन एवं सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए.

yogi sarswat के द्वारा
February 20, 2013

ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर लिखना , सार्थक लिखना सदैव एक चुनौती के सामान है लेकिन आपने बहुत संतुलित शब्दों में सार्थक लेखन दिया है ! एक जगह आपसे असहमति बनती है ! आपने अपने संस्मरण को याद करते हुए लिखा है उस बच्चे ने चमगादड़ से सम्बंधित सवाल पूछा तो आपको उसका सही और स्पष्ट जवाद देना चाहिए था ? मुझे लगता है बच्चों में इस तरह की क्यूरोसिटी होती ही है ! लेकिन आप मेरे से ज्यादा समझती हैं और आप एक अध्यापक रही हैं तो निश्चित रूप से बेहतर समझती हैं बच्चों की मानसिकता को ! गंभीर विषय और बहुत सटीक लेखन आदरणीय विनीता शुक्ल जी !

    vinitashukla के द्वारा
    February 20, 2013

    योगी जी, सर्वप्रथम तो रचना को समय देकर, उस पर विस्तृत प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद. उस समय मेरी आयु भी बहुत परिपक्व नहीं थी, नहीं तो शायद; मामले को अधिक कुशलता के साथ ‘हैंडल’ कर लेती. उस समय तो बात को टालना ही सही लगा- और अभी भी ऐसा ही लगता है क्योंकि अव्वल तो मुझे स्वयम ही इस बात की जानकारी नहीं थी; अध्यापक और शिष्य के बीच, संवाद की मर्यादा बनाये रखना भी जरूरी होता है. दूसरे- बच्चे की कम आयु के कारण, समय से पहले, उसका यह सब जानना ठीक नहीं जान पडा.

krishnashri के द्वारा
February 20, 2013

आदरणीय महोदया , सादर ,बहुत ही संवेदन शील मुद्दे पर आपने सारगर्भित अपने विचार रक्खें है , बातों में दम है .धन्यवाद

    vinitashukla के द्वारा
    February 20, 2013

    समर्थन एवं सराहना के लिए धन्यवाद आदरणीय कृष्णश्री जी.

nishamittal के द्वारा
February 20, 2013

विनीता जी समाज में व्याप्त विकृतियों के सार्थक समाधान सुझाती है. आपकी पोस्ट ,छोटे बच्चों का शोषण एक गंभीरतम समस्या है क्योंकि वो कुछ जानते ही नहीं परन्तु उनकी भाषा में पाठ्यक्रम तैयार होना वास्तव में थोडा कठिन है .

    vinitashukla के द्वारा
    February 20, 2013

    सहमति एवं त्वरित, सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए आभार निशा जी.


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