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नागफनी

Posted On: 19 Jan, 2013 में

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मेरे पास नहीं

बूढ़े बरगद सी बाहें

फैलाकर

जिन्हें अनवरत

बांट सकूं

छांह

वे धरती को चीरती

विकराल जड़ें -

गहराइयों की

लेती जो थाह

पास नहीं मेरे

पीपल का जादुई

संगीत

वो हरी- भरी

काया ,

वह पत्तों का

मर्मर गीत

कोई न

पूजे मुझको

पीपल, बरगद

के मानिंद

कंटकों से

पट गयी है

देह ऐसे-

निकट आते

हैं नहीं

खग वृन्द

मरुथली संसार में

रेत के विस्तार में

जल रहा कण कण जहाँ

कुंठित जीवन जहाँ

वहां वनस्पतियों को -

बनना ही

होता है

नागफनी!

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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
February 28, 2013

नागफनी बनने के निष्कर्ष से मैं सहमत हूँ ! संश्लिष्ट भावों से संपृक्त निर्बंध प्रस्तुति के लिए सादर साधुवाद व मेरी प्रणतिः स्वीकारें !

    vinitashukla के द्वारा
    March 1, 2013

    रचना को सराहने के लिए आभार, आचार्य विजय गुंजन जी.

Sushma Gupta के द्वारा
February 18, 2013

विनीता जी नमस्कार, वनस्पतिओं के माध्यम से जीवन की कुंठाओं को उजागर करती हुई यह सुन्दर रचना मन के दर्शन को उद्वेलित करती हुई सी प्रतीत होती है …साभार आपको वधाई …

    vinitashukla के द्वारा
    February 19, 2013

    प्रशंसा हेतु अनेकानेक धन्यवाद सुषमा जी.

narayani के द्वारा
January 25, 2013

नमस्कार विनीता जी बहुत अच्छी रचना .सुंदर भावाव्यक्ति कुंठित जीवन जहाँ वहां वनस्पतियों को – बनना ही होता है नागफनी! धन्यवाद नारायणी

    vinitashukla के द्वारा
    January 25, 2013

    सद्भावना भरी, सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार नारायणी जी.

akraktale के द्वारा
January 23, 2013

आदरेया विनीता जी सादर, सुन्दर रचना सच है कुंठित जीवन से ही उपजती हैं नागफनी. हार्दिक बधाई स्वीकारें.

    vinitashukla के द्वारा
    January 23, 2013

    सराहना और सद्भावयुक्त प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार.

seemakanwal के द्वारा
January 21, 2013

दार्शनिक रचना .अति भावात्मक . बधाई .

    vinitashukla के द्वारा
    January 21, 2013

    बहुत धन्यवाद आपका सीमा जी.

jlsingh के द्वारा
January 21, 2013

आदरणीया विनीता जी, सादर अभिवादन! दर्द तो है, पर दर्द भी कभी कभी दवा बन जाती है … और ऐसी ही होती है नागफनी … ईश्वर द्वारा निर्मित हर रचना का अपना महत्व होता है! कुंठित जीवन से भी कभी कभी नए पल्लव निकल आते हैं. तब वही रेगिस्तान की शोभा भी बढ़ाते हैं. आपकी रचना का मर्म दिल को छूता है … सादर!

    vinitashukla के द्वारा
    January 21, 2013

    सही कहा आपने. प्रकृति की हर रचना के पीछे कोई न कोई भेद छुपा होता है. रचना को समय देने तथा सिक्के के दूसरे पहलू को सामने लाने हेतु धन्यवाद.

shashibhushan1959 के द्वारा
January 20, 2013

आदरणीय विनीता जी, सादर ! “”मरुथली संसार में रेत के विस्तार में जल रहा कण कण जहाँ कुंठित जीवन जहाँ वहां वनस्पतियों को – बनना ही होता है नागफनी!”" वर्तमान सामाजिक और वैधानिक व्यवस्था से उभरे दर्द का मार्मिक वर्णन ! कब वह दिन आयेगा जब वनस्पतियों को नागफनी बनने के बारे में सोचना न पडेगा ! सादर !

    vinitashukla के द्वारा
    January 20, 2013

    रचना में निहित संवेदना को ग्रहण कर, सकारात्मक प्रतिक्रिया देने हेतु कोटिशः आभार आदरणीय शशिभूषण जी.

minujha के द्वारा
January 20, 2013

नागफनी बन जाने का कारण,उसके पीछे छिपी त्रासदी और पीङा का सजीव चित्रण  विनीता जी,बधाई

    vinitashukla के द्वारा
    January 20, 2013

    रचना के मर्म को ग्रहण करने तथा सराहना के लिए धन्यवाद मीनू जी.

nishamittal के द्वारा
January 19, 2013

सुन्दर चित्रण रेगिस्तानी नागफनी वनस्पति का ,विनीता जी

    vinitashukla के द्वारा
    January 19, 2013

    त्वरित एवं सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार निशा जी.


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