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भारतीय समाज और चारित्रिक पतन

Posted On: 5 Jan, 2013 में

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बढ़ता हुआ उपभोक्तावाद, पश्चिम का आँखें चुन्धियाने वाला ग्लैमर, खुलापन, नग्नता; कितने ही ऐसे कारण हैं जो चारित्रिक पतन के लिए जिम्मेदार हैं। उपभोक्तावाद व बाजारवाद न केवल भ्रष्टाचरण को पोषित करते हैं, मर्यादा को लांघने के लिए भी उकसाते हैं. चमक दमक वाली आधुनिक जीवन शैली ; ‘दो नम्बर’ का पैसा जुटाने को प्रेरित करती है. साथ ही साथ, उन्मुक्तता और कदाचार की मरीचिका में भी धकेलती है. ‘लिव इन’ जैसे संबंधों को मान्यता देने से, परिवार की संस्था, खतरे में पड गयी है. परिवार ही ऐसी संस्था है जहां मर्यादा और संस्कारों की सीख मिलती है. माता पिता का आपसी, पुख्ता सम्बन्ध; उनका मर्यादित आचरण ही बच्चे में नैतिकता को रोपता है. ”लिव इन’ अति महत्वाकांक्षी युवक युवतियों को रास आया है. वे – जो परिवार और बच्चों के चक्कर में, अपने करियर की अनदेखी नहीं करना चाहते. उन लड़कियों के मां बाप, जिनके पास दहेज़ का सामर्थ्य नहीं होता, मजबूरी के तौर पर इसे स्वीकार कर लेते हैं.

स्त्रियों के प्रति अपराध भी बढे हैं. भ्रूण हत्या, दहेज-हत्या, एसिड अटैक, शील-भंग आदि के कई मामले सामने आ रहे हैं. पुरुष-प्रधान समाज में बेटी, कुछ अभिभावकों को बोझ सी लगती है; क्योंकि वह उनके बुढापे की लाठी नहीं बन सकती. उसकी सुरक्षा व दहेज़ आदि का इंतजाम भी करना पड़ता है- सो अलग. इस कारण अभी भी, बेटियों के खान-पान तथा शिक्षा के अवसरों में भेदभाव बरता जाता है. यह सब बातें, स्त्रियों के व्यक्तित्व को कुंठित करती हैं और उन्हें कमजोर बनाती हैं. नारी सशक्तिकरण के लिए, इन कारकों का उन्मूलन, बेहद जरूरी है।
आर्थिक वर्गीकरण की रौशनी में यदि, चारित्रिक पतन की व्याख्या करें तो पायेंगे कि उच्च वर्ग और निम्न वर्ग में, इसकी संभावनाएं ज्यादा हैं। कारण- वर्जनाओं का अभाव। उच्च वर्गीय स्त्री व पुरुष धन के मद में, कुछ भी स्याह सफेद करते फिरें- किसी की हिम्मत नहीं जो उन पर उंगली उठा सके। पैसे की ताकत होती ही कुछ ऐसी है! वहीं दूसरी तरफ निम्नवर्ग में, पैसों की कमी के चलते, देह- व्यापार मजबूरी के तहत किया जाता है। स्त्रियाँ यह सब, अपने परिवारजनों ( पति , बच्चों आदि ) की जानकारी में करती हैं। इस तरह के माहौल में पले बढे बच्चों को, वर्जनाओं को लेकर कोई डर या अपराध- बोध नहीं रह जाता। यहाँ तक कि निर्धनता व भावनात्मक असुरक्षा के चलते, वह भी यौन- शोषण का आसानी से शिकार हो सकते हैं। फलस्वरूप यौन- कुंठा और यौन विकृति, उनके वजूद में पनपने लगती है .ऐसे बच्चे जब बालिग़ होते हैं तो उनसे ये उम्मीद कतई नहीं की जा सकती- कि समाज में रहकर, वे आचरण के मानदंडों को निभायेंगे। दामिनी का सर्वनाश करने वाले युवक भी, निम्न वर्ग से ही सम्बंधित थे। रही बात मध्यम वर्ग की तो – संस्कार और पाबंदियों को मानने वाला तबका यही हुआ करता था। किन्तु बढ़ती मंहगाई ने, गृहणियों को काम काजी औरतों में तब्दील कर दिया है। अब उनके पास बच्चों को संस्कार सिखाने, उन्हें प्यार- दुलार देने का समय ही नहीं। उस पर पाश्चात्य संस्कृति और मीडिया का प्रभाव अलग से।

अशिक्षा और बेरोजगारी भी बढ़ते हुए अपराधों (हत्या, डकैती, बलात्कार आदि) का कारण हो सकती है। अशिक्षित व्यक्ति के लिए, देहसुख ही सबसे बड़ा सुख होता है क्योंकि उसे बौद्धिक सुखों का आभास तक नहीं। यही कारण है कि गाँवों में अनैतिक संबंधों के किस्से, अक्सर देखने- सुनने को मिलते हैं। इसके अलावा अशिक्षा, दबंगों की दबंगई सहने पर विवश करती है। इस भांति, पिछड़े इलाकों के दबंग लोग, निर्धन जनता को पैरों तले रखते हैं। अब बात करें बेरोजगारी की। बेरोजगार युवक, युवती अवसाद में घिरे रहते है और अपना आर्थिक स्तर ऊपर उठाने के लिए, कुछ भी कर गुजरने को तत्पर हो जाते हैं। गर्ल – फ्रेंड को ‘इम्प्रेस’ करने के फेर में, युवक छोटी मोटी चोरी करने से भी बाज नहीं आते। वहीं दूसरी ओर, राजनैतिक संरक्षण प्राप्त अथवा आर्थिक रूप से सम्पन्न युवा, शक्ति के उन्माद में चूर होते हैं . उनमें से कुछ को, नशेबाजी या वेश्यागमन से भी गुरेज नहीं होता।

समय आ गया है कि सभी जागरूक, गणमान्य नागरिक; इस चारित्रिक पतन को रोकने हेतु कमर कस लें। कम से कम, व्यक्तिगत स्तर पर प्रयत्न तो अवश्य करें.

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41 प्रतिक्रिया

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Midge के द्वारा
October 17, 2016

Its a good gel eyeliner with amazing stay po&28w#re30; but somehow I have always loved the Maybelline gel liner in black… the texture is realy good and its lasts on my waterline too Do swatch Maybelline one too and then decide

shashibhushan1959 के द्वारा
January 15, 2013

आदरणीय विनीता जी, सादर ! सामाजिक एवं चारित्रिक पतन अपने चरम पर है ! इस के लिए पश्चिमी संस्कृति के प्रति आकर्षण, मीडिया की अश्लीलता, फूहड़ सिनेमा और पैसे की अंतहीन भूख प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं ! और सबसे बड़े जिम्मेदार हमारे नेता और निति नियंता हैं, जिनकी मूर्खता का परिणाम समस्त देश की जनता भुगत रही है ! बहुत संतुलित विश्लेषणात्मक रचना ! सादर !

    vinitashukla के द्वारा
    January 15, 2013

    सहमति और सराहना हेतु हार्दिक आभार आदरणीय शशिभूषण जी.

jlsingh के द्वारा
January 15, 2013

आदरणीय विनीता जी, सादर अभिवादन ! पता नहीं आपका यह आलेख मुझसे कैसे छूट गया था? … बहुत ही सटीक विश्लेषण किया है आपने ! दोषी हम सभी है इसलिए चारित्रिक उत्थान के लिए हम सबको मिलकर प्रयास करना होगा !

    vinitashukla के द्वारा
    January 15, 2013

    लेख के समर्थन एवं सराहना हेतु अनेकानेक धन्यवाद जवाहर जी.

Nagendra Shukla के द्वारा
January 13, 2013

इस सामाजिक बुराई का समाधान किसी एक के करने से नही होगी बल्कि एक एक व्यक्ति की नैतिक जिम्मेदारी है कि अब अपनी आंखे खोल ले और कमर कस ले कि हमें सुधारना है अपने को भी और अपने समाज को भी केवल अंग्रेजी कपड़े और कल्चर अपना लेने से अंग्रेज नही बन जाता कोई भारतीय हो भारतीय ही बने रहो इसी में हमारी हमारे समाज की, हमारे देश की भलाई है अपने सादा जीवन उच्च विचार में विश्वास रखते हुए उसका पालन करें

    vinitashukla के द्वारा
    January 13, 2013

    विचारणीय टिप्पणी. धन्यवाद नागेन्द्र जी.

vivekvinay के द्वारा
January 12, 2013

विनीता जी आपको इतने सशक्त व् उम्दा लेख हेतु बहुत बहुत बधाई. इस लेख की सबसे अच्छी बात यह है की सभी वर्ग के लोगो पर समान प्रहार किया है आपने. और मुझे पूरा विश्वास है की जो भी इसे एकबार पड़ेगा वो कम से कम दस बार सोचेगा अपने चरित्र के बारे मे. और यही आपकी जीत है. तो आपकी इस जीत के लिए आपको पुनः बधाई. नमस्कार

    vinitashukla के द्वारा
    January 12, 2013

    मेरे ब्लॉग में स्वागत है. लेख के भावों को ग्रहण करने तथा सराहना हेतु आभार.

Santlal Karun के द्वारा
January 10, 2013

आदरणीया विनीता शुक्ला जी, आप ने चर्चित विषय पर व्यापक चिंतन का संक्षिप्त-संतुलित निबंध प्रस्तुत किया है, पढ़कर बहुत अच्छा लगा; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! नव वर्ष की मंगलकामनाएँ ! “आर्थिक वर्गीकरण की रौशनी में यदि, चारित्रिक पतन की व्याख्या करें तो पायेंगे कि उच्च वर्ग और निम्न वर्ग में, इसकी संभावनाएं ज्यादा हैं। कारण- वर्जनाओं का अभाव। उच्च वर्गीय स्त्री व पुरुष धन के मद में, कुछ भी स्याह सफेद करते फिरें- किसी की हिम्मत नहीं जो उन पर उंगली उठा सके। पैसे की ताकत होती ही कुछ ऐसी है! वहीं दूसरी तरफ निम्नवर्ग में, पैसों की कमी के चलते, देह- व्यापार मजबूरी के तहत किया जाता है। स्त्रियाँ यह सब, अपने परिवारजनों ( पति , बच्चों आदि ) की जानकारी में करती हैं। इस तरह के माहौल में पले बढे बच्चों को, वर्जनाओं को लेकर कोई डर या अपराध- बोध नहीं रह जाता। यहाँ तक कि निर्धनता व भावनात्मक असुरक्षा के चलते, वह भी यौन- शोषण का आसानी से शिकार हो सकते हैं। फलस्वरूप यौन- कुंठा और यौन विकृति, उनके वजूद में पनपने लगती है .ऐसे बच्चे जब बालिग़ होते हैं तो उनसे ये उम्मीद कतई नहीं की जा सकती- कि समाज में रहकर, वे आचरण के मानदंडों को निभायेंगे। दामिनी का सर्वनाश करने वाले युवक भी, निम्न वर्ग से ही सम्बंधित थे। रही बात मध्यम वर्ग की तो – संस्कार और पाबंदियों को मानने वाला तबका यही हुआ करता था। किन्तु बढ़ती मंहगाई ने, गृहणियों को काम काजी औरतों में तब्दील कर दिया है। अब उनके पास बच्चों को संस्कार सिखाने, उन्हें प्यार- दुलार देने का समय ही नहीं। उस पर पाश्चात्य संस्कृति और मीडिया का प्रभाव अलग से।”

    vinitashukla के द्वारा
    January 11, 2013

    आदरणीय संतलाल जी, आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए आभार. नूतन वर्ष मंगलमय हो.

    vinitashukla के द्वारा
    January 9, 2013

    समर्थन व सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद.

minujha के द्वारा
January 9, 2013

अच्छा संदेश व सटीक विश्लेषण विनीता जी,

    vinitashukla के द्वारा
    January 9, 2013

    बहुत बहुत धन्यवाद मीनू जी.

alkargupta1 के द्वारा
January 9, 2013

विनीता जी , परिवार उससे सम्बंधित प्रत्येक सदस्य व हम सब ही समाज के अभिन्न अंग हैं और इन अभिन्न अंगों के लिए स्वस्थ मानसिकता और सकारात्मक सोच का होना अति आवश्यक है तब शायद यह पतन रुक सके…. अर्थपूर्ण विश्लेष्णात्मक आलेख की प्रस्तुति के लिए साधुवाद साभार

    vinitashukla के द्वारा
    January 9, 2013

    हार्दिक धन्यवाद अलका जी.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
January 9, 2013

आदरणीया विनीता जी, सादर अभिवादन सार्थक लेख बधाई.

    vinitashukla के द्वारा
    January 9, 2013

    आदरणीय कुशवाहा जी, सादर नमस्कार. सराहना हेतु आभार.

yogi sarswat के द्वारा
January 9, 2013

आदरणीय विनीता जी सादर ! सार्थक और सटीक विश्लेष्ण किया है आपने नैतिकता का पाठ घर से ही शुरू होता है यदि हम सभी इन्ही बातो पर ध्यान दे तो कुछ परिवर्तन तो संभव है, लेकिन यही एक मात्र कारण नहीं है , फिर भी बहुत अहम् बात है !

    vinitashukla के द्वारा
    January 9, 2013

    सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद योगी जी. यह लेख ‘सोशल इश्यू’ के तहत लिखा गया है. इस कारण, यहाँ पर सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर समस्या का विश्लेष्ण किया है. राजनैतिक संरक्षण प्राप्त युवकों के भटकाव का उल्लेख तो है किन्तु राजनीति और माफिया द्वारा पोषित गुंडागर्दी का विस्तार से चर्चा नहीं की गयी है- वैसे भी यह अपने आप में एक विस्तृत विषय है. यदि सम्भव हुआ तो इस पर भी अवश्य लिखूंगी.

akraktale के द्वारा
January 8, 2013

आदरेया विनीता जी सादर, सुन्दर सम्पूर्ण सुगठित और सटीक आलेख.समाज में कहीं मदहोशी है तो कहीं मजबूरियां और इस सब में नैतिकता दोनों ही जगह से नदारत है.बचा क़ानून का डंडा तो वह भ्रष्टाचार कि दलदल में धंसा हुआ है. तब आपके आलेख कि अंतिम पंक्ति जिस पर शायद आपको भी विश्वास कम ही हो यदि कामयाब हुई तो अवश्य ही कल सुनहरा होगा. 

    vinitashukla के द्वारा
    January 8, 2013

    धन्यवाद अशोक जी आपकी विचारशील प्रतिक्रिया एवं सराहना के लिए.

Rachna Varma के द्वारा
January 8, 2013

विनीता जी सार्थक और सटीक विश्लेष्ण किया है आपने नैतिकता का पाठ घर से ही शुरू होता है यदि हम सभी इन्ही बातो पर ध्यान दे तो कुछ परिवर्तन तो संभव है

    vinitashukla के द्वारा
    January 8, 2013

    सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद.

Rachna Varma के द्वारा
January 8, 2013

विनीता जी एक सार्थक प्रस्तुति

    vinitashukla के द्वारा
    January 8, 2013

    आभार रचना जी, सहमति के लिए.

utkarsh singh के द्वारा
January 8, 2013

सामायिक – समकालीन आलेख जो वर्तमान में बह रही अतिवादी विचारों की आंधी में क्षण भर रुक कर सोचने को बाध्य करता है | लगभग इसी विषय पर लिखे मेरे लेख ‘ भारतीय पतन का प्रस्थान बिन्दु ‘ पर आपकी मूल्यवान टिप्पडी आपेक्षित है | अनुग्रहित रहूंगा और संभव है कि कथ्य को कुछ विस्तार भी मिल सके |

    vinitashukla के द्वारा
    January 8, 2013

    बहुत बहुत धन्यवाद उत्कर्ष जी. आपकी पोस्ट को अवश्य पढूंगी- यदि पोस्ट का लिंक दें.

प्रवीण दीक्षित के द्वारा
January 7, 2013

आपकी कलम चुंबकीय है जो सहज ही पाठकों को अपनी ओर आकष्ज्र्ञित करता है …….. पढ़कर कृतज्ञ हुआ ….. हमारे ब्लाॅग पर भी पधारें … !

    vinitashukla के द्वारा
    January 7, 2013

    अनेकानेक धन्यवाद.

nishamittal के द्वारा
January 7, 2013

चारित्रिक पतन के लिए उत्तरदायी कारणों का सटीक विश्लेषण विनीता जी.

    vinitashukla के द्वारा
    January 7, 2013

    हार्दिक आभार निशा जी.,

January 6, 2013

विचार संस्कार बनाने की है , इसका प्रयत्न मैं से ही शुरू होना है , आपके विचार से सहमत होते हुए विनीता जी बहुत 2 साधुवाद

    vinitashukla के द्वारा
    January 7, 2013

    बहुत बहुत धन्यवाद सुधीर जी.

deepasingh के द्वारा
January 6, 2013

आदरणीया विनीता जी वर्तमान की यथार्त्ता को उजागर करता है आपका ये लेख .चारित्रिक पतन आज गंभीर समस्या है और इस पतन को रोकना ही होगा. वन्देमातरम. http://deepasingh.jagranjunction.com

    vinitashukla के द्वारा
    January 6, 2013

    सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु आभार. मेरे ब्लॉग में स्वागत है.

January 6, 2013

सादर प्रणाम! ” समय आ गया है कि सभी जागरूक, गणमान्य नागरिक; इस चारित्रिक पतन को रोकने हेतु कमर कस लें।…………………………………. कम से कम व्यक्तिगत स्तर पर प्रयत्न तो अवश्य करें…………………..अनुकरणीय ………..हार्दिक आभार!

    vinitashukla के द्वारा
    January 6, 2013

    समर्थन एवं सहमति हेतु धन्यवाद.

seemakanwal के द्वारा
January 5, 2013

विनीताजी विचारणीय लेख .साधुवाद

    vinitashukla के द्वारा
    January 5, 2013

    त्वरित एवं सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए आभार सीमा जी.


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