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नारी जीवन में वर्जनाओं की भूमिका

Posted On: 22 Dec, 2012 में

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“मैं फसल उगाती हूँ
वह खा जाता है
चुनती हूँ लकड़ियाँ
वह ताप लेता है
मैं तिनका तिनका बनाती हूँ घर
वह गृह स्वामी कहलाता है
उसे चाहिए बिना श्रम किये
सब कुछ
मैं सहती जाती हूँ
जानती हूँ
ऐसे समाज में रहती हूँ
जहाँ अकेली स्त्री को
बदचलन साबित करना
सबसे आसान काम है
और यह बात मेरा मरद
अच्छी तरह जानता है |”

अपनी पोस्ट को, सुश्री रंजना जायसवाल की इस कविता से, आरम्भ कर रही हूँ. हमारे समाज में स्त्री को लेकर कुछ ऐसे पूर्वाग्रह हैं- जो युगों युगों से चले आ रहे हैं। स्त्रियों के साथ होने वाले अत्याचारों का एक प्रमुख कारण है, उन पर थोपे गये दोगले नैतिक- मानदंड। एक ऐसी स्त्री, जो पुरुष द्वारा त्यागी गयी हो, विधवा होने के कारण एकाकी जीवन व्यतीत कर रही हो अथवा दहेज़ के अभाव में कुंवारी रह गयी हो – नित नई अग्नि- परीक्षा से गुजरती है। जबकि अकेले रहने वाले पुरुष के चरित्र पर, कोई उंगली नहीं उठाता। तभी तो ये औरतें, व्यभिचारियों के निशाने पर रहती हैं। नारी के यौन- शोषण में, वर्जनाओं की मुख्य भूमिका है। छेड़खानी का विरोध करने वाली स्त्री को ही, बेहया और चरित्रहीन करार दे दिया जाता है। इसके चलते, दुराचारियों के हौसले बुलंद रहते हैं। नारी द्वारा लगाये गये, दुर्व्यवहार के आरोप को, वृहद दृष्टिकोण से तौलने- परखने का प्रयास किया जाना चाहिए। स्त्री के प्रति संकुचित सोच, उसे कमजोर बनाती है और शोषण के कुचक्र में झोंक देती है। एक सच्चा उदाहरण देना चाहूंगी। मेरी एक परिचिता थीं जो बहुत मेधावी छात्रा थीं. एक दिन वे अपने संस्थान की गैलरी से गुजर रही थीं। संयोग से आस- पास कोई नहीं था। इतने में एक चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी ने उन्हें अश्लील इशारा किया। उनके लिए अपनी आँखों पर विश्वास करना कठिन था। उस व्यक्ति का सामाजिक स्तर, उन दीदी से कहीं नीचे था। कदाचित एक लडकी का, पढ़- लिखकर जीवन में ऊपर उठना, उसकी कुंठित मनोवृत्ति को सुहाया नहीं। उसे पूर्ण विश्वास था कि दीदी इस घटना को अनदेखा कर देंगी और बात आई- गयी हो जायेगी।

किन्तु वे हार मानने वालों में से नहीं थीं। उन्होंने यह बात सबसे पहले, अपने साथ पढने वाले लडकों को बतायी। फिर उन लड़कों के जरिये यह बात, टीचिंग- स्टाफ तक पहुंची। उनके पुरुष सहपाठियों ने उस कर्मचारी को जोरों से धमकाया। सभी सहपाठी उनके समर्थन में उठ खड़े हुए। अध्यापक उन्हें व्यक्तिगत तौर पर जानते थे- लिहाजा वे भी दीदी के साथ हो लिए. बात उस कर्मचारी को डिसमिस करने तक आगे बढ़ी। अंततः उस व्यक्ति ने, दीदी को ‘बहन’ कहकर और पाँव छूकर, उनसे माफ़ी मांगी। अपने परिवार व छोटे छोटे बच्चों की खातिर, मामले को रफा दफा करने की गुजारिश की- तब जाकर उसकी जान छूटी। यदि हर स्त्री को इसी प्रकार, लोगों का नैतिक समर्थन मिलता रहे तो अपराधी अवश्य डरेंगे। हमारा सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास कुछ ऐसा रहा है कि किसी न किसी रूप में नारी का दमन हुआ है। लम्बे विदेशी शासन के दौरान, आक्रान्ताओं की कुदृष्टि से बचाने के लिए, नारी को घर की चारदीवारी में कैद कर दिया गया। पर्दा प्रथा लागू हो गयी। बाल-विवाह भी चलन में आया। परन्तु इस सबसे, नारी का अस्तित्व नगण्य होने लगा। शिक्षा के मूलभूत अधिकार को खोकर, वह अपने पतिगृह के लिए नौकरानी और पति के लिए भोग्या एवं बच्चे पैदा करने की मशीन बनकर रह गयी।

जो पुरुष अपने बचपन में माँ को, सदा पिता से प्रताड़ित होते हुए देखता रहा हो; अपनी अशिक्षित बहनों के साथ होने वाले, सौतेले व्यवहार का साक्षी रहा हो- उसके अवचेतन में नारी की छवि एक दोयम दर्जे के प्राणी की ही होगी। ऐसा व्यक्ति क्या नारी का सम्मान कर सकेगा? इसी मानसिकता के चलते नारी, शैशव में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में बेटे के दुर्व्यवहार का शिकार होती रही। क्या घर से बाहर कदम न रखने पर, उसकी सुरक्षा सुनिश्चित हो सकी? निकट सम्बन्धियों, ससुर, जेठ आदि के द्वारा उसकी अस्मत पर हमले होते रहे। सुश्री आशापूर्णा देवी के कालजयी उपन्यास, ‘प्रथम प्रतिश्रुति’ की नायिका के दर्द से, पाठक अनभिज्ञ नहीं हैं। सुश्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कथा ‘मंझली रानी’ की नायिका निर्दोष होते हुए भी, जेठानी और समाज द्वारा ‘कुलटा’ ठहरा दी जाती है. बाल- विवाह और अशिक्षा का एक सुन्दर उदाहरण इस कहानी से मिलता है. सभी पुरुष एक से नहीं होते। शिक्षित माता के सान्निद्य में पला- बढ़ा पुरुष, जिसने अपनी माता से भावनात्मक सुरक्षा और संस्कार पाए हों – नितांत विपरीत सोच रखता है। समय के साथ नारी की शक्ति बढ़ी, वह शिक्षित हुई। उस पर भी, वह पुरुष के समकक्ष न बन सकी। पढ़ी लिखी कामकाजी औरत को, घर और बाहर की दोहरी जिम्मेदारी, संभालनी पड़ती है। वह पैसे कमाकर देती है- किन्तु पति बहुधा, घर के कामों में, उसका हाथ नहीं बंटाता। क्योंकि ऐसा करने से ,उसका पुरुषत्व आहत होता है। इस प्रकार, बरसों बाद भी नर; नारी के प्रति अपनी बीमार सोच को, नहीं बदल सका।

बॉस के रूप में एक महिला को देखना, कई पुरुषों को अखरता है. अपनी महिला सहकर्मी को आगे निकलते देख, कुछ पुरुष ईर्ष्यावश; उस पर ‘बॉस’ से अनैतिक सम्बन्ध रखने का, आरोप तक लगा देते हैं. नारी की विडम्बना यह है कि यदि वह घर के बाहर, वजूद तलाशे- तो अपने परिवार और बच्चों की उपेक्षा से, उसे आत्मग्लानि होती है. लेकिन यदि वह परिवार के लिए अपने हितों को त्याग कर, घर में बैठी रहे- तो भी उसके त्याग को, सही तौर पर, कोई समझ नहीं पाता. एक गृहणी अपनी छोटी- छोटी जरूरतों के लिए, पति पर निर्भर करती है और इस कारण समय समय पर, उसकी उपेक्षा और तिरस्कार को भी झेलती है. हमारे समाज में स्त्री पर पाबंदियाँ लगाना और उसके पंख कतरना एक सहज प्रवृत्ति है. जब चाहे उसे ‘रौंद’ देना भी, इस घृणित मानसिकता का ही हिस्सा है. मेरा दावा है कि जो लड़का अपने परिवार में, पिता द्वारा, माँ/ बहनों का सम्मान होते हुए देखता हो. जिसने बालपन से माँ, बहनों का स्नेह पाया हो; शिक्षित, शक्तिरूपा माता द्वारा संस्कार और मार्गदर्शन पाया हो- वह कभी व्यभिचारी हो ही नहीं सकता.

वर्जनाएं सदैव बुरी हों ऐसा नहीं है. स्त्रियाँ कोमलांगी होती है- अतः यह उनके लिए, कहीं न कहीं जरूरी भी हैं. वर्जनाओं के अतिक्रमण का दुष्प्रभाव, विदेशी जीवन- शैली में देखा जा सकता है. इस प्रकार जो वर्जनाएं, मर्यादा का पालन करना सिखाएं- अच्छी हैं. आज की युवा पीढ़ी को यह समझने की, बहुत जरूरत है. उच्चवर्ग और निम्नवर्ग- जहां वर्जनाओं का महत्व कमतर है; स्त्रियाँ व पुरुष दोनों ही, आचरणविहीन हो सकते हैं. लेकिन वर्जनाओं को, अन्यायपूर्ण और गलत तरीके से लागू करना भी ठीक नहीं. एक लड़की यदि लड़- झगड़कर, घर से निकल जाये – चरित्रहीन मानी जाएगी( भले ही उसकी देह अनछुई और पवित्र हो). वह घर की दहलीज़ पर, दुबारा पैर नहीं रख सकेगी किन्तु इसके विपरीत घर का लड़का रूठकर, कहीं चला जाये तो उसके पुनरागमन पर खुशियाँ मनाई जायेंगी; उसका स्वागत किया जाएगा. क्या चरित्र के मानदंडों को, समान रूप से, पुरुष पर लागू करने की आवश्यकता नहीं?

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80 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

इंसान के द्वारा
May 4, 2013

विनीता बेटी आपके इस सुंदर निबंध के लिए आपको मेरा साधुवाद| भारतीय समाज में मर्यादा का पालन एक बहुत महत्वपूर्ण क्रिया रही है| इसी प्रकार भारतीय समाज में व्यक्तिवाद व औसत भारतीय में विशिष्ठ के ब्रह्मदंड का आचरण हमारी सनातन संस्कृति की अनुपम देन हैं| आज जब समाज में भ्रष्टाचार और अनैतिकता का घिनौना तांडव चल रहा है, वैश्विक दृष्टी से ऐसी स्थिति केवल अभिशाप बन कर रह गई है| “कबीरा तेरी झोंपरी गल कटियन के पास, करनगे सो भरन्गे, तू क्यूँ भयो उदास!” अवश्य ही समाज में व्यक्तिवादी विचार है| पाश्चात्य संभ्यता में व्यक्तिवादी नहीं, संगठित समाज द्वारा “गल कटियन” को तुरंत दंडित किया जाता है| घर में माता पिता और घर के बाहर धार्मिक व सामाजिक संस्थाएं यदि मनुष्य को बचपन से ही मर्यादा का पाठ पढाएं तो मनुष्य में आत्मसंयम द्वारा समाज की हर प्रकार की बुराईयों को दूर किया जा सकता है| इसके अतिरिक्त, मनुष्य के चंचल चरित्र पर प्रभावी अंकुश लगाये रखने हेतु प्रायश्चित व दंड का उचित प्रावधान बहुत आवश्यक है| अत: चरित्र की मर्यादा व सामाजिक संगठन भारतीय समाज के अभिन्न गुण होने चाहियें| मेरा दृढ़ विश्वास है कि इन गुणों द्वारा संगठित भारतीय नागरिक अपना व दूसरों का जीवन सुखमयी बना सकते हैं और देश को उन ऊँचाइयों पर ले जा सकते हैं जहां विश्व में भारत को उचित सम्मान मिल पाये| ऐसे वातावरण में भारतीय समाज नारी को उचित स्थान देने को तत्पर रहेगा|

    vinitashukla के द्वारा
    May 4, 2013

    आपकी इस सुंदर, विवेचनात्मक प्रतिक्रिया हेतु, हार्दिक आभार आदरणीय.

Ramesh Nigam के द्वारा
January 4, 2013

Excellent! In t he next blog, it will be pleasing to note your action plan for eliminating the ILL EFFECTS of foreign invaders, who forced us to adopt JAUHAR, PARDA, BAL VIVAH……………….. With best wishes to the blogger, Ramesh Nigam

    vinitashukla के द्वारा
    January 5, 2013

    Thanks a lot Ramesh ji.

narayani के द्वारा
January 2, 2013

नमस्कार ,विनीता जी ,सप्ताह का ‘बेस्ट ब्लॉगर’ बनने की हार्दिक बधाई . बहुत अच्छा लेख। नारायणी

    vinitashukla के द्वारा
    January 3, 2013

    हार्दिक आभार नारायणी जी.

Tufail A. Siddequi के द्वारा
December 31, 2012

आदरणीया विनीता जी सादर अभिवादन, बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ द वीक चुने जाने पर हार्दिक बधाई | बहुत ही सारगर्भित लेख. -तुफैल ए. सिद्दीकी http://siddequi.jagranjunction.com

    vinitashukla के द्वारा
    December 31, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद तुफैल जी.

itsanil के द्वारा
December 31, 2012

congratulations, for picking up the best blogger of the week.

    vinitashukla के द्वारा
    December 31, 2012

    Thanks a lot.

sudhajaiswal के द्वारा
December 29, 2012

आदरणीया विनीता जी, बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ द वीक चुने जाने पर हार्दिक बधाई |

    vinitashukla के द्वारा
    December 29, 2012

    हार्दिक धन्यवाद सुधा जी.

प्रवीण दीक्षित के द्वारा
December 28, 2012

आदरणीय विनीता जी , बेस्ट ब्लोगर बनाने के लिए आपको बधाई,  नारी की मार्मिक तस्‍वीर उकेरती इस अदभुत रचना को हमारे जैसे पाठकों को भी पढ्ने का मौका मिला , यह किसी  तोहफे से कम नहीं । शुक्रिया । क्रपया हमारी पोस्‍ट का भी अवलोकन करें और अपनी कीमती और आवश्‍यक राय जरूर दें लिंक : http://www.praveendixit.jagranjunction.com

    vinitashukla के द्वारा
    December 28, 2012

    कोटिशः धन्यवाद.

विवेक मनचन्दा के द्वारा
December 28, 2012

विनीता जी ,सप्ताह का ‘बेस्ट ब्लॉगर’ बनने की हार्दिक बधाई । आपको नव वर्ष 2013 की हार्दिक शुभकामनायें । विवेक मनचन्दा

    vinitashukla के द्वारा
    December 28, 2012

    हार्दिक आभार विवेक जी. आपको भी नव वर्ष मंगलमय हो.

munish के द्वारा
December 28, 2012

आदरणीय विनीता जी , बेस्ट ब्लोगर बनाने के लिए आपको बधाई, अंतिम पहरे में आपने लेख को एकतरफा होने से बचा लिया, दिल्ली वाली गैंगरेप की घटना के बाद से जागरण जंक्शन पर बहुत से विद्वान ब्लोगरों के विचार पढने को मिले और निश्चित ही विचार तो सराहनीय हैं ही ……..! लेकिन उक्त घटना से पूर्व आदरणीय सरिता जी ने एक लेख लिखा था “निकलो न बेनका” शायद आपने भी पढ़ा हो …….. मेरा मानना है की हर एक को अपने विचारों के साथ उस लेख को साथ रख कर विचार करने की आवश्यकता है शायद कुछ समाधान निकल सके ……. और उक्त विषय पर सभी लेख जो इस समय सामयिक भी लग रहे हैं परन्तु अपूर्ण से भी हैं को पूर्णता मिल सके …. हालांकि आपके लेख पर आदरणीय राकेश जी ने अपने विचार रखे हैं जिनसे असहमत नहीं हुआ जा सकता और आपका लेख भी जो कहीं कहीं एकतरफा सा लगता है या पूर्णता को खोजता सा लगता है को बल मिला है फिर भी यही कहूँगा की बहुत अच्छा लिखा है, आदरणीय सरिता जी के लेख का लिंक दे रहा हूँ यदि आपने न पढ़ा हो तो अवश्य निगाह डालें http://sinsera.jagranjunction.com/2012/11/10/%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8B-%E0%A4%A8-%E0%A4%AC%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A4%95%E0%A4%BC%E0%A4%BE%E0%A4%AC/

    vinitashukla के द्वारा
    December 28, 2012

    मुनीश जी, इस आलेख का उद्देश्य अच्छी और बुरी वर्जनाओं पर प्रकाश डालना था. अंतिम पैरा में मैंने लिखा भी है, “स्त्रियाँ कोमलांगी होती है- अतः यह उनके लिए, कहीं न कहीं जरूरी भी हैं. वर्जनाओं के अतिक्रमण का दुष्प्रभाव, विदेशी जीवन- शैली में देखा जा सकता है. इस प्रकार जो वर्जनाएं, मर्यादा का पालन करना सिखाएं- अच्छी हैं. आज की युवा पीढ़ी को यह समझने की, बहुत जरूरत है.” इन चंद पंक्तियों में ही मेरा मन्तव्य स्पष्ट हो गया है. वैसे भी, विस्तारपूर्वक चर्चा , सम्भव नहीं. पूनम पांडे और शर्लिन चोपडा सरीखी औरतों के बारे में क्या और कैसे कहा जाय? मीडिया पर अंकुश लगाना भी जरूरी है- लेकिन इस पर बात करना विषय से भटकने जैसा होगा. आपकी विचारशील प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद.

tejwani girdhar के द्वारा
December 28, 2012

अति सुंदर

    vinitashukla के द्वारा
    December 28, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद.

drvandnasharma के द्वारा
December 28, 2012

बधाई हो , आपने बहुत ही सारगर्भित लेख लिखा है हम आपसे सहमत है दोष समाज की दोहरी मानसिकता में ही है पीड़ित लड़की को ही आलोचनाओ का सामना करना पड़ता है लडको को उसी प्रकार नियंत्रित आचरण करना sikhaya jaye dono की saman parvarish की jaye to sayad kuch hal nikle

    vinitashukla के द्वारा
    December 28, 2012

    समर्थन एवं सराहना के लिए अनेकानेक धन्यवाद.

surendr shukl bhramar के द्वारा
December 28, 2012

आदरणीया विनीता जी बधाई हो बेस्ट ब्लॉगर आफ दी वीक के लिए …सुन्दर सार्थक लेख ….. हमारे समाज में स्त्री पर पाबंदियाँ लगाना और उसके पंख कतरना एक सहज प्रवृत्ति है. जब चाहे उसे ‘रौंद’ देना भी, इस घृणित मानसिकता का ही हिस्सा है. मेरा दावा है कि जो लड़का अपने परिवार में, पिता द्वारा, माँ/ बहनों का सम्मान होते हुए देखता हो. जिसने बालपन से माँ, बहनों का स्नेह पाया हो; शिक्षित, शक्तिरूपा माता द्वारा संस्कार और मार्गदर्शन पाया हो- वह कभी व्यभिचारी हो ही नहीं सकता. इन पंक्तियों ने मन को छू लिया सार है ये ….संस्कार बहुत जरुरी है बच्चे को सब कुछ दिया गया संस्कार नहीं दिया गया वो अधूरा ही रहेगा चाहे धन के तालाब में वो डुबकी लगाता रहे ….वर्जनाएं बुरी नहीं होती बहुत जरुरी हैं स्वतंत्रता जैसे जरुरी है सामंजस्य रख कर चलना होता है …काश लोग सोचें समझें और करें तो आनंद और आये भ्रमर ५

    vinitashukla के द्वारा
    December 28, 2012

    धन्यवाद भ्रमर जी, सराहना एवं उत्साहवर्धन के लिए. आपने सच कहा कि संस्कार के साथ साथ वर्जनाओं और स्वतन्त्रता में संतुलन बनाकर रखना जरूरी है. जब यह संतुलन टूट जाता है तब या तो वर्जनाओं का पलड़ा भारी हो जाता है और या इंसान जरूरत से ज्यादा स्वछन्द हो जाता है. दोनों ही स्थितियां घातक हैं. एक तरफ जहां अनावश्यक पाबंदियां, शोषण का पर्याय बन जाती हैं वहीं दूसरी तरफ अत्यधिक उन्मुक्तता मर्यादा के क्षरण का कारण.

jlsingh के द्वारा
December 27, 2012

सप्ताह की ‘सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर’ का सम्मान प्राप्त करने के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें, विनीता जी !

    vinitashukla के द्वारा
    December 27, 2012

    हार्दिक आभार जवाहर जी.

akraktale के द्वारा
December 27, 2012

सप्ताह की बेस्ट ब्लोगर बनने पर आपको सादर बहुत बहुत बधाई आदरेया विनीता शुक्ला जी. 

    vinitashukla के द्वारा
    December 27, 2012

    हार्दिक धन्यवाद अशोक जी.

rakesh के द्वारा
December 27, 2012

देश की आधी आबादी को जरुरी मानसिक पोषण नहीं मिला …इसी मानसिक कुपोषण की वजह से शायद आज की सांवली स्त्री /लड़की स्वयं को कुरूप और कुरूपता को सबसे बड़ा अभिशाप मानती है और गोरे रंग को सबसे बड़ा हथियार मानती हैं… पश्चिमी मीडिया ने ”फेयर न लवली ” को सबसे बड़े वरदान के तौर पर पेश किया है …. इससे आम (गरीब ) भारतीय लड़कियों (जो आर्थिक तौर पर उतनी समृद्ध नहीं हैं की रूप सज्जा पर अनाप -शनाप खर्च कर सके ) में हीन भावना को बाल मिला है … देश में महिला विदुशियाँ उँगलियों पर गिनी जा सकती हैं लेकिन बॉलीवुड , टोलीवुड , भोजीवुड .. और दूरदर्शन के कितने ही प्रायोजित कार्यक्रमों में निहायत चमचमाती हुई सैकड़ों लड़कियों को देखा जा सकता है … क्या यही वास्तविक महिला सशक्तिकरण है ? आर्थिक उदारीकरण के बाद स्थिति “कोढ़ में खाज ” वाली हो चली है … कंडोम और आई -पिल्स के विज्ञापन तो देश की हर सड़क , चौराहे और मेडिकल स्टोर पर तंग गए हैं , साइबर युद्ध, इन्टरनेट पोर्नोग्राफी , सिनेमा और दूरदर्शन की सेंसरशिप को विदेशी चश्मे से देखा जाने लगा है और कभी -कभी तो नग्नता न दिखा पाने को स्वतंत्र अभिव्यक्ति का हनन तक करार दिया जाने लगा है एक सम्मानित पर्त्रिका तहलका ने नग्नता की इच्छा जताने वाली एक अभिनेत्री (पूनम पाण्डेय ) का महिमामंडन कुछ इसी प्रकार से किया है…. क्या यह नग्नता नारी आज़ादी का प्रतिक बनने वाली है? आज भारतीय सामाजिकता के अधकचरे ज्ञान ने भारतीय मानस को इस कदर भ्रम में डाल दिया है कि सही क्या है वो उसे दकियानूसी मानने लगा है और जो गलत है वह प्रेरक लगने लगा है .. इन्ही प्रभावों के चलते आज वेश्यावृत्ति कि वैधानिकता के लिए दर्जनों समूह झंडा लिए घूमते हैं . क्या वे भारतीय सन्दर्भ में वेश्यावृत्ति के आर्थिक सामाजिक स्वरुप के भारतीय जनमानस पर होने वाले प्रभाव के बारे में कोई अध्ययन या विशेषज्ञता रखते हैं .. शायद नहीं! या नाम मात्र … हमारे अतुल्य भारत में हमने ही दुनिया में सबसे पहले “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते , रमन्ते तत्र देवता ” का सिद्धांत दिया “दुर्गा सप्तशती ” के रूप में हमने सर्वशक्तिमान नारी की आराधना शुरू की और आज भी करते हैं . लेकिन यह सोचने का विषय है की आधी आबादी के लिए बने उद्देश्य सिर्फ मूर्तिपूजा तक क्यों सिमट गए ? मानवीय त्रिगुनो (रज , सत और तम ) में देश काल और परिस्थितियों में जो प्रधान हो उसी का प्रतिरूपण सामाजिक दशा को प्रदर्शित करता है . ये त्रिगुण आर्थिक-सामाजिक कारकों से प्रेरित या प्रभावित होते हैं (आधुनिक मनोविज्ञान में प्रेरण और उद्दीपन का सिद्धांत )…अंग्रेजों के मानसपुत्रों द्वारा लिखा इतिहास भारतीय संस्कृति को नारी-शक्ति का सबसे बड़ा दुश्मन बताता है. देवदासी प्रथा , सती -प्रथा , बाल -विवाह जैसे अत्याचारी कुप्रथाएं होने के पीछे क्या तर्क देता है … इन तर्कों पर विश्वास करके हम अपनी सांस्कृतिक विरासत का अवमूल्यन करते चले आ रहे हैं .. जिस देश की आत्मा ही स्त्री को सर्वशक्तिमान इश्वर स्वरुप मानती रही हो … यदि आज वो देश इस दशा में पहुँच जाये तो यह मनुष्य की प्राकृतिक स्वाभाव और देश की चेतना किसी के अनुरूप नहीं है … हम जिन मूल्यों को दकियानूसी मानते हैं उसी की उपेक्षा से ये परिस्थितियां पैदा हुई हैं … आधी आबादी के साथ हो रहा अत्याचार ” अत्यधिक चिंतनीय हैं ..यदि आप भारतीय सन्दर्भ में इसके मूल कारकों की खोज करना चाहते हैं तो आपको भारतीय मूल्यों के ऐतिहासिक उन्नयन और उस पर विदेशी आक्रमणों के प्रभाव का अध्ययन करना ही होगा. वहीँ पर इसका मूल निहित है और वहीँ पर समाधान भी.800 सालों से चल रहे विदेशी आक्रमणों और षड्यंत्रों के प्रभाव से शिक्षा और समाज दोनों अलग -अलग रास्तों पर जा रहे हैं … और सामाजिक सक्रियता ख़त्म हो गयी है … जब मुख्यधारा में विदेशी प्रभाव इस कदर होंगे तो मुख्यधारा की दशा और उसमे व्यक्ति का अस्तित्व नगण्य हो जाता है … … देश की सांस्कृतिक विरासत ने काम (सेक्स … वात्सायन का कामसूत्र ) और प्रेम के जो सिद्धांत दिए हैं उनको आप दकियानूसी मन लेते हैं तो फिर आप दोष किसे देते हैं … भारतीय इतिहास में प्रेम कभी अपराध नहीं रहा है (इसका एक विभ्रंश रूप ’ऑनर किल्लिंग ’ है लेकिन इसके किसी विरोधी ने जहमत नहीं उठाई की यह क्या है और क्यों हुआ ? ) शायद ऐतिहासिक विवेचन और मानव व्यव्हार के अध्ययन से इसके विरोध कि शुरुआत होनी चाहिए थी…. . कानून तो बहुत हैं लेकिन सवाल यह हैं कि आप किसी व्यक्ति के मन पर कौन से कानून से नियंत्रण कीजियेगा ..? मन पर नियंत्रण मूल्य आधारित शिक्षा से होगा , उन कारकों के वैज्ञानिक विश्लेषण से होगा जिनको आप दकियानूसी मान के छोड़ देना चाहते हैं .. हामारी करोड़ों वर्ष पुरानी सभ्यता में कभी नारी -शक्ति के साथ अत्याचार नहीं हुए … इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो इसके लिए निम्नलिखित सुझाव हैं .. 1. आज की सामाजिक दुर्दशा गुलामी एवं पश्चिमी प्रभावों की देन है .. देश की मूल सांस्कृतिक विरासत को शिक्षा में समाहित किया जाये .. 2. स्थानीय प्रशासन का सशक्तिकरण करके ऐसी घटनाओं में पीडिता को त्वरित न्याय दे सकने में समर्थ बनाया जाये . FIR दर्ज करना प्रशासन के नैतिक कर्तव्यों के साथ सेरविसे रूल बुक में लीगल तौर पर शामिल किया जाये . ताकि पीडिता को दर -दर भटकना न पड़े . 3. पीडिता के मनोपचार और पुनर्वास हेतु विशेषज्ञों का एक स्वतंत्र पैनेल (जिसमे कम से कम एक डॉक्टर, मनोवैज्ञानिक, अपराध विज्ञानं विशेषज्ञ,परामर्श विद. न्यायिक कार्याधिकारी , पुलिस का प्रतिनिधि , मीडिया प्रतिनिधि, और स्थानीय जनप्रतिनिधि शामिल हों. ) हर स्थानीय प्रशासन की इकाई में शामिल किया जाये ताकि न्याय में देरी और न्यायिक प्रक्रिया में पीडिता हताशा का शिकार न हो . न्याय में देरी न्याय न मिलने के बराबर है. 4. बाल -मष्तिष्क पर अभद्र दूरदर्शन कार्यक्रमों का असर ऐसी घटनाओं के लिए नकारात्मक प्रेरण की भूमिका निभाता है .. इसके लिए कार्यक्रमों को आयु समूह के अनुसार प्रदर्शित किया जाये . 5. महिलाओं के साथ सद्व्यवहार करने वाले कर्मचारियों को समयांतर में सम्मानित करने से समरसता को बढ़ावा मिलेगा . 6. सामान्य स्थानों (पार्क , रेस्टोरेंट इत्यादि .) में हो रहे प्रेमालाप से जन मानस पर सदैव नकारात्मक प्रभाव होता रहा है . इसे सख्ती से रोका जाये . इस प्रकार के प्रयास से ऐसे स्थानों पर होने वाली छेड़ -छड की घटनाओं पर निश्चित रूप से अंकुश लगाना संभव होगा . 7. स्थानीय प्रशासन में सामाजिकी और मानविकी के विशेषज्ञों का स्थायी तौर पर स्वतंत्र नियुक्ति हो ताकि उनके सहयोग से ऐसी घटनाओं के की समीक्षा एवं पारिस्थितिकीय कारकों को खोज कर उसकी पुनरावृत्ति रोकी जा सके . 8. स्थानीय प्रशासन को पीडिता के परिवार की यथासंभव मदद मानवीय सन्दर्भों में करनी चाहिए , शासन से अपेक्षा है की वह सर्वश्रेष्ठ चिकित्सकीय सुविधा से पुनर्वास तक का जिम्मा उठाये . 9. प्रेम प्रसंगों या विवाहोपरांत इस प्रकार की घटनाओं को काउंसिलिंग या परिवार न्यायालय के स्तर से सुलझाने का प्रयास सराहनीय होगा . स्थितियां गंभीर हों तो सामान्य न्याय प्रक्रिया उचित हो सकती है . 10. बदले की भावना में लगाये गए आरोपों , शासन प्रणाली के सदस्यों , डॉक्टरों और न्यायाधिकरण के सम्मानित सदस्यों द्वारा किये गए संदर्भित अपराधों को एक श्रेणी में रख के सख्त से सख्त सजा दी जाये . 12. सभी घटना पत्रों को व्यवस्थित और लिपिबद्ध करके स्वतंत्र पुनर्विवेचन के लिए सर्व सुलभ किया जाये .

    jlsingh के द्वारा
    December 27, 2012

    आदरणीय राकेश जी, मैं आपके विचार का आदर करता हूँ और समर्थन भी! आपके विचार बहस का विषय हो सकते हैं, लेकिन आपके द्वारा उठाये गए सभी बिंदु विचारणीय हैं! जरूरत है एक स्वस्थ सोच विकसित करने की जिसे घर और पाठशाला में विकसित किया जा सकता है! सादर आभार!

    vinitashukla के द्वारा
    December 27, 2012

    आपके विचार अत्यंत सराहनीय हैं. आपने सच कहा- जरूरत से ज्यादा खुलापन और अपने प्राचीन नैतिक मूल्यों की अवहेलना से ही आज यह स्थिति उत्पन्न हुई है. गंभीर चिंतन को समाहित किये हुए इस विस्तृत एवं अर्थपूर्ण प्रतिक्रया के लिए कोटिशः आभार राकेश जी.

    vinitashukla के द्वारा
    December 27, 2012

    सही कहा जवाहर जी.

minujha के द्वारा
December 27, 2012

 सम्मान मिलने की बहुत बहुत बधाई विनीता जी

    vinitashukla के द्वारा
    December 27, 2012

    हार्दिक धन्यवाद मीनू जी.

alkargupta1 के द्वारा
December 27, 2012

सप्ताह की सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर का सम्मान प्राप्त करने के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें विनीता जी ,

    vinitashukla के द्वारा
    December 27, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद अलका जी.

alkargupta1 के द्वारा
December 27, 2012

विनीता जी , मैं आपके आलेख से पूर्णतः सहमत हूँ…… संस्कारों की प्रथम पाठशाला तो अपना घर और परिवार ही हैं वहीँ से हमारे सुसंस्कारों और कुसंस्कारों का पाठ शुरू हो जाता है इसलिए बहुत ही आवश्यक हो गया है कि लड़कियों और लड़कों दोनों को ही सुसंस्कार दिए जाएँ तभी समस्याओं का समाधान होता दिखाई देता है…….सुन्दर आलेख के लिए बधाई ….

    vinitashukla के द्वारा
    December 27, 2012

    सहमति एवं प्रोत्साहन हेतु हार्दिक आभार अलका जी.

Vandana Baranwal के द्वारा
December 27, 2012

आदरणीया विनीता जी, सप्ताह की सर्वश्रेष्ठ ब्लोगर बनने पर हार्दिक बधाइयाँ.

    vinitashukla के द्वारा
    December 27, 2012

    हार्दिक धन्यवाद वंदना जी.

VIVEK KUMAR SINGH के द्वारा
December 27, 2012

आदरणीया विनीता जी , आपको सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर बनने पर ढेर सारी बधाईयाँ | आपने बिलकुल सटीक लेख लिखा है | मैं आपके समर्थन में हूँ और उन मानदंडों को अब लागू करना जरुरी हो गया है | सादर नमस्कार |

    vinitashukla के द्वारा
    December 27, 2012

    अनेकानेक धन्यवाद विवेक जी, आपकी सकारात्मक और उत्साहवर्धक प्रतिक्रया हेतु.

yogi sarswat के द्वारा
December 26, 2012

जो पुरुष अपने बचपन में माँ को, सदा पिता से प्रताड़ित होते हुए देखता रहा हो; अपनी अशिक्षित बहनों के साथ होने वाले, सौतेले व्यवहार का साक्षी रहा हो- उसके अवचेतन में नारी की छवि एक दोयम दर्जे के प्राणी की ही होगी। ऐसा व्यक्ति क्या नारी का सम्मान कर सकेगा? इसी मानसिकता के चलते नारी, शैशव में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में बेटे के दुर्व्यवहार का शिकार होती रही। क्या घर से बाहर कदम न रखने पर, उसकी सुरक्षा सुनिश्चित हो सकी? निकट सम्बन्धियों, ससुर, जेठ आदि के द्वारा उसकी अस्मत पर हमले होते रहे। सुश्री आशापूर्णा देवी के कालजयी उपन्यास, ‘प्रथम प्रतिश्रुति’ की नायिका के दर्द से, पाठक अनभिज्ञ नहीं हैं। सुश्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कथा ‘मंझली रानी’ की नायिका निर्दोष होते हुए भी, जेठानी और समाज द्वारा ‘कुलटा’ ठहरा दी जाती है. बाल- विवाह और अशिक्षा का एक सुन्दर उदाहरण इस कहानी से मिलता है. सभी पुरुष एक से नहीं होते। शिक्षित माता के सान्निद्य में पला- बढ़ा पुरुष, जिसने अपनी माता से भावनात्मक सुरक्षा और संस्कार पाए हों – नितांत विपरीत सोच रखता है। एक गंभीर विषय पर सार्थक लेखन दिया है आपने ! लेकिन इस बात से पूर्ण सहमती शायद नहीं बन सकती क्यूंकि ऐसे भी केस देखे हैं जहां भरे पूरे परिवार में परवरिश पाने वालों ने भी उस परिवार पर दाग लगाया है !

    vinitashukla के द्वारा
    December 27, 2012

    योगी जी, मैंने यहाँ एक general बात कही है. वैसे अपवाद तो हर जगह होते हैं. रचना को समय देने तथा विचारशील प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद.

    yogi sarswat के द्वारा
    December 27, 2012

    बहुत बहुत बधाई आपको , बेस्ट ब्लोग्गर ऑफ़ दी वीक होने पर !

    vinitashukla के द्वारा
    December 27, 2012

    कोटिशः धन्यवाद योगी जी.

Dr S Shankar Singh के द्वारा
December 26, 2012

अत्यंत संवेदनशील विषय पर आपने बहुत अच्छा लिखा है,. यदि हर स्त्री को, लोगों का नैतिक समर्थन मिलता रहे तो अपराधी अवश्य डरेंगे। स्त्री आज भी वर्जनाओं में जकड़ी हुई है. इसमें कुछ अच्छी और कुछ बुरी और अनावश्यक हैं. हमारा समाज पतनोन्मुख है. अराजकता और अनैतिकता का माहौल है. कुछ वर्जनाएं स्त्री की सुरक्षामें सहायक साबित हो सकती हैं. इस समस्या का हमें दो स्तरों पर सामना करना पड़ेगा. एक तो हमें अपने बेटों को ऐसे संस्कार देने होंगे कि वे अपनी बहनों और सभी स्त्रियों की इज्ज़त करना सीखें. दूसरे ऐसे कानून की नितांत आवश्यकता है कि अपराधी ऐसे घृणित जघन्य अपराध के बारे में सोचने की भी हिम्मत न कर सके. एक बात मैं आपके साथ शेयर करना चाहता हूँ कि मैं एक वैज्ञानिक संस्थान से सेवा निवृत्त हुआ. जहाँ भारी संख्या में उच्च वैज्ञानिक शिक्षा( MSc , PhD ) प्राप्त लड़कियां कार्यरत हैं. वहाँ लड़कियों और लड़कों में में बड़े अच्छे पारस्परिक सम्मानजनक सम्बन्ध हैं. आप शायद यकीन न करें. मुझे कोई भी आपत्तिजनक बात कभी सुनने को नहीं मिली. आपने जो घटना बताई है वह भी संभव है. यह निर्भर करता है शिक्षा के स्तर और पारिवारिक पृष्ठभूमि पर. माहौल बदल रहा है. मुझे यह जानकार ख़ुशी हो रही है की आप जैसी महिलायें जागरूक हैं. मेरे अन्दर आशा का संचार हुआ है. आगे चलकर कुछ अच्छा ही होगा. एक अच्छे लेख के लिए बहुत बहुत बधाई.

    vinitashukla के द्वारा
    December 27, 2012

    इस सुन्दर, विस्तृत प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार.

December 25, 2012

विनीता जी , बात तो आपकी सही है ,मैं आपके विचार से सहमत हूँ पर एक बात मेरे समझ में नहीं आई कि एक लड़की को अश्लील हरकत करने और लड़की के साहस से व्यक्ति को डिसमिस करने की जब स्थिति आ सकती है तब लड़कियां अपने आत्मविश्वास को इतना मजबूत क्यों नहीं कर पाती कि वह हर समस्याओं का समाधान स्वयं कर सकती हैं । मैं तो मानता हूँ कि कुछ लोग ही मनोवैगनिक रूप से बीमार होते हैं जिसके कारण समस्या होती है बाकी पर पॉज़िटिव और मर्यादित होकर अपनी बात रखी जा सकती है , विश्वास किया जा सकता है । जैसा आपने अपने आलेख में भी उदाहरण दिया है । वैसे आपके आलेख से सहमत

    vinitashukla के द्वारा
    December 25, 2012

    सुधीर जी, लडकियां इस बात से डरती हैं कि यदि किसी ने छेड़खानी के विरोध में उनका साथ नहीं दिया तो वे मुफ्त में ही बदनाम हो जाएँगी. बसों, सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर लोग छेड़खानी की घटनाओं को देखकर भी अनदेखा कर देते हैं. इसके अलावा भय इस बात का भी होता है है कि छेड़खानी का खुलासा करने पर, लोग उनसे उस बारे में सौ सवाल करेंगे और उन्हें शर्मिंदा होना पडेगा. उनके परिचित, इस तरह की छोटी घटना को लेकर भी, तिल का ताड़ बना सकते हैं और वह बेचारी ‘गॉसिप’ का विषय बन जायेगी. कई बार तो लडकी के घर वाले ही, उसे ऐसे मामले में चुप्पी साध लेने को कहते हैं. विचारशील प्रतिक्रया हेतु धन्यवाद.

sudhajaiswal के द्वारा
December 25, 2012

आदरणीया विनीता जी, सादर अभिवादन, हमारा समाज दोहरी मानसिकता का शिकार है सच है लोग आधुनिकता की दौड़ में आँखे मूंदे भागे जा रहे हैं, नैतिक मूल्यों और संस्कारों की घुट्टी बचपन से ही लडको को भी उसी तरह पिलाई जाये जैसे कि लड़कियों को दोनों को ही अनुशासित रखने की, मर्यादा में रहने की सीख देनी होगी | लेख में उठए गए आपकी बातों से मै सहमत हूँ |

    vinitashukla के द्वारा
    December 25, 2012

    प्रोत्साहन व समर्थन के लिए धन्यवाद सुधा जी.

R P Pandey के द्वारा
December 25, 2012

vinita जी ,सामाजिक बर्जनावो को नारिया भले न माने लेकिन प्राकृतिक बर्जनावो को तो मानना ही चाहिए .आज जो जितना ज्यादे अंग प्रदर्शन कराती है वह उतनी बड़ी फ़िल्मी कलाकार . पूनम पाण्डेय को तो आप जानती ही होगी .फ़िल्मी हीरो पर लड़किया किस तरह टूट पड़ती है यह आपके सज्ञान में होगा .ताज्जुब तो यह है की ऐसी लड़कियों के माँ बाप टी बी और पेपरों में उस सीन को बड़े बेताबी से ढूढते है .इसका मतलब कदापि मत समझिएगा की मई रेप का समर्थन कर रहा हु ,लेकिन इतना निश्चित है की क़ानून से कुछ नहीं होगा .इसके पहले ऐसे ही केश में रंगा बिल्ला को फ़ासी हो चुकी है .

    vinitashukla के द्वारा
    December 25, 2012

    आदरणीय, आपकी बात बिलकुल सही है. मैंने भी अपने ब्लॉग में यह माना कि वे वर्जनाएं अच्छी होती हैं जो मर्यादा का पालन करना सिखाएं और यह भी कि स्त्रियों के कोमलांगी होने के कारण कहीं न कहीं वर्जनाएं उनके लिए आवश्यक भी हैं. मैंने तो बस, वर्जनाओं को लेकर, समाज की बीमार और दोगली सोच पर प्रश्न खडा किया है. मेरे ब्लॉग पर आने और अपने विचार प्रकट करने हेतु आपका धन्यवाद.

seemakanwal के द्वारा
December 24, 2012

क्या कीजियेगा हमारे समाज का दोहरा चरित्र है .

    vinitashukla के द्वारा
    December 24, 2012

    इसी समस्या का हल तो हम सबको मिलकर ढूंढना है. प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद सीमा जी.

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
December 24, 2012

मान्या विनीता जी, सादर !…… स्त्री -पुरुष जीवन रूपी शकट के दो पहिये हैं ! परस्पर सहयोग se ही जीवन सुखमय हो सकता है | समाज में में दोनों ही का समान दर्जा का होना ही जीवन के शुभ -संकेत हो सकते हैं ! सुन्दर आलेख के लिए हार्दिक बधाई !

    vinitashukla के द्वारा
    December 24, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद आपका.

rekhafbd के द्वारा
December 24, 2012

विनीता जी जो लड़का अपने परिवार में, पिता द्वारा, माँ/ बहनों का सम्मान होते हुए देखता हो. जिसने बालपन से माँ, बहनों का स्नेह पाया हो; शिक्षित, शक्तिरूपा माता द्वारा संस्कार और मार्गदर्शन पाया हो- वह कभी व्यभिचारी हो ही नहीं सकता., आपसे शत प्रतिशत सहमत ,सुंदर आलेख पर हार्दिक बधाई

    vinitashukla के द्वारा
    December 24, 2012

    रेखा जी, वैचारिक समर्थन व सराहना हेतु कोटिशः धन्यवाद.

    jlsingh के द्वारा
    December 25, 2012

    रेखा जी के साथ मैं भी आपका समर्थन करता हूँ. संस्कार अपने घर से ही मिलता है! हम सभी धार्मिक पुस्तक, धार्मिक अनुष्ठान को भूलते जा रहे हैं जबकि इनके मूल में अगर देखा जाय तो संस्कार पैदा करने की क्षमता धर्म में है!

    vinitashukla के द्वारा
    December 25, 2012

    विचारशील प्रतिक्रिया एवं समर्थन हेतु धन्यवाद जवाहर जी.

utkarshsingh के द्वारा
December 24, 2012

बेहद संतुलित और अप्रितम आलेख | वर्जनाये सभी के लिए जरुरी है चाहे स्त्री हो या पुरुष उनमे लिंग भेद नही किया जाना चाहिए | वर्जनाओं के त्याग में ही स्त्री स्वतंत्रता को पारिभाषित करना एक छलावा है | एक तार्किक लेख हेतु बधाई स्वीकार करे |  

    vinitashukla के द्वारा
    December 24, 2012

    सुंदर शब्दों में समर्थन हेतु आभार उत्कर्ष जी.

akraktale के द्वारा
December 23, 2012

विनीता जी सादर, बहुत सुन्दर आलेख शब्द शब्द दिल में उतर रहा है वक्त के साथ बदलाव के कारण जहां नारी घर में कैद हो गयी थी आज उसकी पुनः अपने अतीत को प्राप्त करने कि जंग चल रही है किन्तु इतने लंबे अरसे से उन्मुक्त घूमता पुरुष इतनी आसानी से इसे कैसे पचाए. दुःख होता है जब अपना पौरुष दिखाने के लिए नर अपराध करता है.हम जहां नारी के समानता के करीब आने से खुश होते हैं वहीं ऐसी जघन्य घटनाएं हमें फिर पीछे धकेल देती हैं. आपके सुन्दर आलेख पर बधाई.

    vinitashukla के द्वारा
    December 23, 2012

    रचना में निहित संवेदना को ग्रहण कर, सकारात्मक प्रतिक्रिया देने हेतु कोटिशः आभार अशोक जी.

Sushma Gupta के द्वारा
December 22, 2012

बिनिता जी नमस्कार ,आपने बिलकुल सही प्रश्न किया है कि क्या चरित्र के मानदंडों को सामान रूप से ,पुरुष पर लागू करने कि आवश्यकता नहीं ? उत्तर हाँ में ही होगा ,परन्तु वास्तव में यह प्रश्न यथावत ही रहेगा ,जबतक हम अपने समाज कि मानसिकता को नहीं बदलेंगें ,इसके लिए समाज में जैसा कि आपने स्वयं कहा कि बच्चों को प्रारम्भ से ही अच्छे संस्कार दिए जाएँ .माता-पिता पुत्र-पुत्री दोनों को समान समझें ,साथ ही समाज भी … नव -बर्ष कि शुभकामनाओं सहित ..गीता जयंती के उपलक्ष्य में मेरे ब्लॉग स्वागत …

    vinitashukla के द्वारा
    December 22, 2012

    सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए आभार सुषमा जी. नव वर्ष आपको भी शुभ हो. आपके ब्लॉग पर अवश्य आऊंगी.

Santlal Karun के द्वारा
December 22, 2012

आदरणीया विनीता शुक्ला जी, नैतिक-सांस्कृतिक अधोपतन पर अत्यंत विचारणीय, पठनीय प्रस्तुति, हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! “वर्जनाएं सदैव बुरी हों ऐसा नहीं है. स्त्रियाँ कोमलांगी होती है- अतः यह उनके लिए, कहीं न कहीं जरूरी भी हैं. वर्जनाओं के अतिक्रमण का दुष्प्रभाव, विदेशी जीवन- शैली में देखा जा सकता है. इस प्रकार जो वर्जनाएं, मर्यादा का पालन करना सिखाएं- अच्छी हैं. आज की युवा पीढ़ी को यह समझने की, बहुत जरूरत है. उच्चवर्ग और निम्नवर्ग- जहां वर्जनाओं का महत्व कमतर है; स्त्रियाँ व पुरुष दोनों ही, आचरणविहीन हो सकते हैं. लेकिन वर्जनाओं को, अन्यायपूर्ण और गलत तरीके से लागू करना भी ठीक नहीं.”

    vinitashukla के द्वारा
    December 22, 2012

    समर्थन एवं सराहना के लिए हार्दिक आभार, आदरणीय संतलाल जी.

minujha के द्वारा
December 22, 2012

विनीता जी अति विचारणीय आलेख,सच तो यही है कि नारी की वर्तमान दुर्दशा के लिए अधिकांशतया नारी ही जिम्मेदार होती है,हम अपने बनाए जाल में यूं उलझते-बिखरते रहते है तो सामने वाला फायदा क्यों ना उठाए…,आपके प्रश्न का जवाब हमें खुद मिलकर ढूंढना होगा…सार्थक लेखन की बधाई

    vinitashukla के द्वारा
    December 22, 2012

    हार्दिक धन्यवाद मीनू जी, सकारात्मक एवं विचारशील प्रतिक्रिया हेतु.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
December 22, 2012

आदरणीया विनीता जी, सादर अभिवादन सार्थक लेख. अच्छा प्रश्न बधाई

    vinitashukla के द्वारा
    December 22, 2012

    सादर प्रणाम आदरणीय कुशवाहा जी. सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु आभार.

nishamittal के द्वारा
December 22, 2012

विनीता जी व्यवहारिक उदाहरण व सरल भाषा में आपने सच्चाई को वर्णित किया है.संग्रहनीय आलेख पर बधाईनारी और नर दोनों के लिए वर्जनाएं बनी हैं परन्तु हमारे समाज का ढांचा ऐसा कि सदा नारी ही भुगतती आयी है,अतः वर्जनाओं को माना ही श्रेयस्कर है.

    vinitashukla के द्वारा
    December 22, 2012

    आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद निशा जी. मैंने भी अपने आलेख में यह माना कि जो वर्जनाएं मर्यादा का पालन करना सिखाये वह अच्छी हैं. आपकी बात सही है कि समाज की दोगली मान्यताओं को स्वीकार करना स्त्री की मजबूरी है किन्तु चरित्र के जो मानदंड स्त्री पर लागू किये गये हैं- क्या पुरुष को उनसे सर्वथा मुक्त रहना चाहिए ? इस पोस्ट के जरिये मैं यही प्रश्न पूछना चाहती हूँ.

    nishamittal के द्वारा
    December 22, 2012

    विनीता जी यही कहने का प्रयास मैंने किया है पुरुष को समस्त वर्जनाओं को उसी प्रकार स्वीकार करने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए,परन्तु अफ़सोस नारी शक्ति आज भी इतनी जागृत नहीं और स्वयम पुरुष अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारेगा क्यों? यही कारण है कि पुरुष का कुछ नहीं बिगड़ता,चाहे वो किसी का शील भंग करे,किसी लड़की का अपमान करे ,शराब पिए,गाली गलौज करे या फिर घर में बैठकर नारी को प्रताडित करे,

    vinitashukla के द्वारा
    December 22, 2012

    पुनः धन्यवाद निशा जी, इस विचारशील व अर्थपूर्ण प्रतिक्रिया के लिए.

krishnashri के द्वारा
December 22, 2012

आदरणीय महोदया , सादर , मैं आपकी सभी बातों से सहमत हूँ , अच्छे आलेख के लिए बधाई

    vinitashukla के द्वारा
    December 22, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय.


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