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चरण- स्पर्श (लघुकथा)

Posted On: 17 Dec, 2012 Others में

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रमिता रंगनाथन, मिसेज़ शास्त्री की खातिर में यूँ जुटी थीं- मानों कोई भक्त, भगवान की सेवा में हो। क्यों न हो- एक तो बॉस की बीबी, दूसरे फॉरेन रिटर्न। अहोभाग्य- जो खुद उनसे मिलने, उनके घर तक आयीं! पहले वडा और कॉफ़ी का दौर चला फिर थोड़ी देर के बाद चाय पीना तय हुआ। इस बीच ‘मैडम जी’, सिंगापुर के स्तुतिगान में लगीं थीं- “यू नो- उधर क्या बिल्डिंग्स हैं! इत्ती बड़ी बड़ी…’एंड’ तक देख लो तो सर घूम जाता है…और क्या ग्लैमर!! आई शुड से- ‘इट्स ए हेवेन फॉर शॉपर्स’…” रमिता ने महाराजिन को, चाय रखकर जाने का इशारा किया. गायित्री शास्त्री ने चाय का प्याला उठाया भी, पर एक ही घूँट के बाद मुंह सिकोड़ लिया- “इट्स वैरी स्ट्रोंग! हम लोग तो फॉरेन- ट्रिप में बहुत लाईट ‘टी’ पीते थे…एंड फ्लेवर वाज़ सो सूदिंग!! ” रमिता कुढ़ गयी. श्रीमती जी को ‘शीशे में उतारना’ इतना सहज न था. तभी उसे कुछ सूझा और तब जाकर- दिमाग की तनी हुई नसें, थोडी ढीली पड़ीं.
“विनायक” उसने बेटे को आवाज़ दी,” जरा देखो तो कौन आया है.” विनायक का प्रवेश हुआ; उसने रट्टू तोते की भांति आंटी को ‘गुड -मॉर्निंग’ विश किया तो रमिता बोली, “ऐसे नहीं, आज ‘विशु’( एक तमिल त्यौहार) है. आज के दिन बड़ों का पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं” विनायक ने झुककर गायित्री के चरण छुए तो उन्हें बेस्वाद चाय को भूलकर, ‘गार्डेन गार्डेन’ होना ही पडा. इम्पोर्टेड चौकलेट का डिब्बा बेटे को थमाते हुए, रमिता ने कहा, “ये स्वीट्स आंटी सिंगापुर से लायी हैं- इट्स लाइक ए विशु गिफ्ट फॉर यू ” फिर गर्व से ‘मैडम’ को देखकर कहा, “अवर इंडियन कलचर यू नो!” न चाहते हुए भी ‘श्रीमतीजी’ चारों खाने चित्त हो गयीं थीं- अपने पति की ‘जूनियर’ के आगे!
यह तो अच्छा ही हुआ कि विनायक का गिटार- टीचर थोडा लेट आया. नहीं तो वो भी यहीं सोफे में बैठ जाता और रंग में भंग पड जाता. विनायक को रमिता ने ताकीद भी कर रखी थी- “इस आदमी को लिविंग रूम में मत बैठाया करो…यह हमारी बराबरी का नहीं.” पर बेटा प्रतिवाद करने की कोशिश करता, “अम्मा, मुकुन्दन मेरे गुरु हैं और मैं उनकी इज्ज़त करता हूँ” लेकिन माँ की जलती हुई आँखों के आगे, उस बेचारे की गुरु भक्ति धरी रह जाती.मुकुन्दन को आते देख रमिता, वर्तमान में लौट आई. परन्तु यह वो क्या देख रही थी! विनायक ने लपककर, अपने उस ‘तथाकथित’ गुरु के पैर छू लिए!! माँ के आपत्ति से भरे हाव- भाव भी, बेटे को विचलित न कर सके. मुस्कुराकर बोला, ” इट्स विशु अम्मा” और मुकुन्दन को लेकर भीतर चला गया. रमिता चुपचाप, उन्हें जाते हुए देखती रही -बिलकुल असहाय सी!!!

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17 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
December 26, 2012

कम शब्दों में अपनी बात कही है आपने ! और बहुत सार्थक रूप से कही है ! हमारी संस्कृति के सामने विदेश के बड़े बड़े भवन भी खंडहर नजर आते हैं., लेकिन कभी कभी ये महल टूटते से नज़र आते हैं !

    vinitashukla के द्वारा
    December 27, 2012

    सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु आभार योगी जी.

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
December 19, 2012

उत्प्रेरक व कटाक्ष से परिपूर्ण लघुकथा के लिए विनीता जी आप को हार्दिक बधाई !

    vinitashukla के द्वारा
    December 20, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद.

akraktale के द्वारा
December 19, 2012

आदरेया विनीता जी सादर, बहुत सुन्दर लघुकथा. हमारी संस्कृति के सामने विदेश के बड़े बड़े भवन भी खंडहर नजर आते हैं. सुन्दर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें.

    vinitashukla के द्वारा
    December 20, 2012

    समर्थन और सराहना के लिए आभार अशोक जी .

alkargupta1 के द्वारा
December 19, 2012

विनीता जी , बहुत सुन्दर इस लघु कथा के माध्यम से वर्तमान परिदृश्य का यथार्थ चित्रण किया है……. सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई

    vinitashukla के द्वारा
    December 20, 2012

    हार्दिक धन्यवाद अलका जी, सराहना के लिए.

krishnashri के द्वारा
December 18, 2012

आदरणीय महोदया , सादर , आपने आज के सच को बड़ी खूबसूरती से उकेरा है , शुभकामना .

    vinitashukla के द्वारा
    December 18, 2012

    अनेकानेक धन्यवाद आदरणीय कृष्णश्री जी.

jlsingh के द्वारा
December 18, 2012

तभी तो उसका नाम विनायक रखा है … विनयशीलता तो होनी ही चाहिए आखिर हिन्दुस्तानी है न! बहुत सुन्दर! विनीता जी आप भी ‘विनीता’ ही है!….हा हा हा …

    vinitashukla के द्वारा
    December 18, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद जवाहर जी.

nishamittal के द्वारा
December 18, 2012

बहुत सुन्दर ,प्रेरक,शिक्षाप्रद लघु कथा विनीता जी.

    vinitashukla के द्वारा
    December 18, 2012

    कहानी को सराहने के लिए हृदय से आभार निशा जी.

    nishamittal के द्वारा
    December 18, 2012

    विनीता जी आपकी रचनाएँ या प्रस्तुति सदा ही प्रेरक होती हैं.

vinitashukla के द्वारा
December 18, 2012

कोटिशः धन्यवाद निशा जी.


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