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देश के नाम- कुछ भावोद्गार

Posted On: 21 Nov, 2012 में

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आज के निर्णायक दिन पर- जब देश के शत्रु को फांसी मिली, अपने कुछ भावोद्गार राष्ट्र को समर्पित कर रही हूँ. आज प्रसन्नता है कि ‘देर आये दुरुस्त आये’ की तर्ज़ पर एक ऐतिहासिक निर्णय लिया गया; किन्तु इसमें इतनी देर हुई कि आतंकियों के हौसले बढ़ते चले गये. प्रस्तुत हैं दो कविताएँ, देश के लिए:
१-
मेरे देश!
कहाँ तेरी पहचान?
वह परंपरा सनातन-
गंगा- जमुनी
वह संस्कृति;
जहां होते एकरूप -
धर्म /दर्शन/ विचारधाराएँ
पंथ /सम्प्रदाय औ’ सभ्यताएं
माटी जिससे उपजे-
कबीर और रसखान ….
मेरे देश!
कहाँ तेरी पहचान?
पसर गए
दिशा दिशा
रक्तबीज द्वेष के
घातक होते तेवर -
बदले परिवेश के
विष घुला हवाओं में
दर्द है फिजाओं में
वोट और नोट में
बंट गया इंसान
मेरे देश
कहाँ तेरी पहचान?
———————–
२ –
शब्द दर शब्द
चुक रही हैं इबारतें
गीता के श्लोक
वेदों की सीख
कुरआन की आयतें
शब्द……………
१- ‘बांटों और राज करो’
फिरंगी- रणनीति थी
पर असम, काश्मीर ने
पुनः वह गाथा कही
हाशिये पर हाँफते
लाचारियों के काफिले
बेसबब चलती रहीं -
सियासती कवायदें
शब्द……………
२- भेड़ सम जनचेतना
जो हांकते थे रहनुमा -
कुर्सियों के खेल ने
पहुंचा दिया उनको कहाँ!
लूट, बदहाली पे फिर
ये शोरोगुल तब किसलिए?
मर गयी इंसानियत
ज़िंदा रहीं रवायतें
शब्द …………….
३- देश है जिनकी बपौती
व्यवस्था जिनकी गुलाम
घोटालों का खेल खेलें रोज वे
सुलगे अवाम
तांडव से आतंक के -
फिर बस्तियां उजड़ी तमाम
पंगु जनादेश पर
कायम रही विरासतें
शब्द ………………….

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39 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Dina के द्वारा
October 17, 2016

Ah yes, nicely put, evenoyre.

yogi sarswat के द्वारा
December 26, 2012

भेड़ सम जनचेतना जो हांकते थे रहनुमा – कुर्सियों के खेल ने पहुंचा दिया उनको कहाँ! लूट, बदहाली पे फिर ये शोरोगुल तब किसलिए? मर गयी इंसानियत ज़िंदा रहीं रवायतें शब्द ……………. बहुत खूब , सुन्दर पंक्तियाँ !

    vinitashukla के द्वारा
    December 27, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद, योगी जी.

seemakanwal के द्वारा
December 15, 2012

शब्द दर शब्द चुक रही हैं इबारतें गीता के श्लोक वेदों की सीख कुरआन की आयतें शब्द… बहुत खुबसूरत रचना .बधाई . 

    vinitashukla के द्वारा
    December 15, 2012

    अनेकानेक धन्यवाद सीमा जी.

mayankkumar के द्वारा
December 10, 2012

आपकी कलम में चुंबकीय आकष्ज्र्ञण है जो सहज ही पाठकों को अपनी ओर आकष्ज्र्ञित करता है …….. पढ़कर कृतज्ञ हुआ ….. हमारे ब्लाॅग पर भी पधारें … !

    vinitashukla के द्वारा
    December 11, 2012

    सकारात्मक और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद.

प्रवीण दीक्षित के द्वारा
December 4, 2012

आदरणीय विनीता जी, सादर प्रणाम , बस इतना कहूँगा बहुत बहुत बहुत बहुत खूब !! कृपया हमारी पोस्ट्स पर भी अपनी राय दें लिंक : http://praveendixit.jagranjunction.com धन्यवाद !

    vinitashukla के द्वारा
    December 5, 2012

    धन्यवाद प्रवीण जी, मेरे ब्लॉग में आने और सराहना हेतु. आपकी रचनाएँ अवश्य पढूंगी.

rekhafbd के द्वारा
December 1, 2012

विनीता जी बांटों और राज करो’ फिरंगी- रणनीति थी पर असम, काश्मीर ने पुनः वह गाथा कही हाशिये पर हाँफते लाचारियों के काफिले बेसबब चलती रहीं – सियासती कवायदें,अति सुंदर शब्दों से सजी सुंदर रचना ,बढ़ी

    vinitashukla के द्वारा
    December 1, 2012

    हार्दिक धन्यवाद रेखा जी.

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
December 1, 2012

नए तेवर के साथ नए भावोद्गार ! उत्तमोत्तम ! विनीता जी , सादर बधाई !

    vinitashukla के द्वारा
    December 1, 2012

    रचना को समय देने व सराहने के लिए आभार.

yogi sarswat के द्वारा
December 1, 2012

मेरे देश! कहाँ तेरी पहचान? पसर गए दिशा दिशा रक्तबीज द्वेष के घातक होते तेवर – बदले परिवेश के विष घुला हवाओं में दर्द है फिजाओं में वोट और नोट में बंट गया इंसान मेरे देश कहाँ तेरी पहचान? पहली कविता जहां अपनी खोई हुई विरासत और अतीत की बात करती है वहीँ आपकी दूसरी कविता वर्तमान को आइना दिखाई है ! बहुत सुन्दर ! दौनों रचनायें , पठनीय ! बहुत बधाई आदरणीय विनीता शुक्ल जी !

    jlsingh के द्वारा
    December 1, 2012

    विनीता जी को हार्दिक बधाई! आपके शब्द अनमोल हैं! वोट और नोट में बंट गया इंसान मेरे देश कहाँ तेरी पहचान?

    vinitashukla के द्वारा
    December 1, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद योगी जी.

    vinitashukla के द्वारा
    December 1, 2012

    जवाहर जी, अनेकानेक धन्यवाद .

Sushma Gupta के द्वारा
November 25, 2012

बिनीता जी,आज देश की दुर्दशा ,जो आपकी सहज सुन्दर रचना में मुखरित उठी है,’ …देश है जिनकी बपौती व्यवस्था जिनकी गुलाम घोटालों का खेल खेलें रोज वे सुलगे अवाम… …साभार

    vinitashukla के द्वारा
    November 27, 2012

    सुंदर शब्दों में सराहना हेतु धन्यवाद सुषमा जी.

bebakvichar, KP Singh (Bhind) के द्वारा
November 24, 2012

घातक होते तेवर – बदले परिवेश के विष घुला हवाओं में दर्द है फिजाओं में वोट और नोट में बंट गया इंसान मेरे देश कहाँ तेरी पहचान? विनीताजी, वास्तविक चिंता का सुंदर प्रस्तुतिकरण….

    vinitashukla के द्वारा
    November 24, 2012

    प्रोत्साहन व प्रशंसा हेतु आभारी हूँ.

अजय यादव के द्वारा
November 23, 2012

आदरणीय विनीता जी, सादर प्रणाम , देशभक्ति से भरी बड़ी सुंदर रचना ,मोहिन्दर जी का कमेन्ट पढकर मुझे कवियत्री विनीता चौहान कि कुछ पंक्तियाँ याद आ गयी – “तुमने दस-दस लाख दिए हैं वीरों की विधवाओं को , यानी कीमत लौटा दी है वीर-प्रसूता माओं को , लो मैं बीस लाख देता हूँ तुम किस्मत के हेठों को , हिम्मत है मंत्री लड़ने भेजें अपने बेटों को……..!” (विनीत चौहान) http://avchetnmn.jagranjunction.com/

    nishamittal के द्वारा
    November 24, 2012

    बहुत सुन्दर प्रतिक्रिया अजय जी ,परन्तु इनकी आत्मा कैसे जगे.

    vinitashukla के द्वारा
    November 24, 2012

    सकारात्मक प्रतिक्रिया एवं सुंदर पंक्तियों को साझा करने हेतु धन्यवाद अजय जी.

    vinitashukla के द्वारा
    November 24, 2012

    विचारने योग्य प्रश्न निशा जी. वर्तमान परिस्थितियों में, यही तो सबसे बड़ी समस्या है.

Mohinder Kumar के द्वारा
November 23, 2012

विनीता जी, देश का दुर्भाग्य है कि यहां एक शहीद सैनिक और एक शहीद आंतकवादी में अधिक अन्तर नहीं है. एक दुर्दांत आंतकवादी जिसने अनेक प्राण ले लिये उसके खिलाफ़ इतनी देर से निर्णय लिया गया… जब कि एक शहीद सैनिक को चंद दिनों में सब भूल जाते है और कोई यह देखने नहीं जाता कि उसके पीछे उसके परिवार का क्या हुआ… जबकि एक आंतकवादी के परिवार को उसके आका पूरी तरह मदद देते हैं. लिखते रहिये.

    vinitashukla के द्वारा
    November 24, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद मोहिन्दर जी, इस विचारशील प्रतिक्रिया के लिए.

akraktale के द्वारा
November 22, 2012

देश है जिनकी बपौती व्यवस्था जिनकी गुलाम घोटालों का खेल खेलें रोज वे सुलगे अवाम तांडव से आतंक के – फिर बस्तियां उजड़ी तमाम पंगु जनादेश पर कायम रही विरासतें शब्द …………………. वाह! बहुत सुन्दर रचना आदरेया विनीता जी सादर बधाई स्वीकारें.

    vinitashukla के द्वारा
    November 22, 2012

    सराहना एवं प्रोत्साहन हेतु, कोटिशः धन्यवाद अशोक जी.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
November 22, 2012

जय भारत मित्र जय भारत वन्दे मातरम् आदरणीय विनीता जी, सादर आभार नमस्कार

    vinitashukla के द्वारा
    November 22, 2012

    नमस्कार आदरणीय कुशवाहा जी. सकारात्मक टिप्पणी हेतु आभार, धन्यवाद.

seemakanwal के द्वारा
November 21, 2012

२- भेड़ सम जनचेतना जो हांकते थे रहनुमा – कुर्सियों के खेल ने पहुंचा दिया उनको कहाँ! बहुत सही परिभाषित किया है आप ने . बधाई .

    vinitashukla के द्वारा
    November 22, 2012

    प्रशंसा व प्रोत्साहन हेतु धन्यवाद सीमा जी.

nishamittal के द्वारा
November 21, 2012

बहुत सुन्दर भावों से परिपूर्ण सामयिक रचनाएँ विनीता जी.बधाई रक्तबीज द्वेष के घातक होते तेवर – बदले परिवेश के विष घुला हवाओं में दर्द है फिजाओं में वोट और नोट में बंट गया इंसान मेरे देश कहाँ तेरी पहचान?

    vinitashukla के द्वारा
    November 22, 2012

    सराहना और समर्थन के लिए कोटिशः आभार निशा जी.


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