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कितनी ही बातें.....

Posted On: 5 Nov, 2012 में

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कितनी ही बातें
मथती हैं मन को
कई कई बार
अंतस के सागर में
उमड़ घुमड़ चलते हैं
लपटों से जलते हैं
अनगिनत विचार
कितनी…………….
यह कैसा मंथन है -
अमृत घट रीता है
नहीं कोई नीलकंठ
अब विष को पीता है
आसुरी छलावे से
छले देवता जाते
कस्तूरी में अटकी
हृदय-हरिण की साँसे!
कुंठा से बद्ध हुए
आकुल उदगार
कितनी ……………
पीड़ा है- दंशन भी
मोह है- सम्मोहन भी
सर्पिल पगडण्डी सी-
जीवन की राहें
भवसागर में-
प्राणों की
नौका लहराए
विप्लव में उलझा
भावों का संसार
कितनी …………….

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51 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Janess के द्वारा
October 17, 2016

I enjoy your blog.How about more information about “self pu;nsihilg&#8221b? The one person I know who tried it had a bad experience.Is that the norm? Can an author successfully “self publish”?

Sushma Gupta के द्वारा
November 19, 2012

प्रिय बिनीता जी, कितनी …………… पीड़ा है- दंशन भी मोह है- सम्मोहन भी सर्पिल पगडण्डी सी- जीवन की राहें आपके द्वारा जो एक आत्मिक -पीड़ा की अनुभूति कराई गई वह अद्वितीय है…..वधाई…

    vinitashukla के द्वारा
    November 21, 2012

    आभारी हूँ सुषमा जी. धन्यवाद.

seemakanwal के द्वारा
November 12, 2012

भावपूर्ण रचना .हार्दिक बधाई

    vinitashukla के द्वारा
    November 13, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद सीमा जी.

Madan Mohan saxena के द्वारा
November 12, 2012

उम्दा पंक्तियाँ .बेह्तरीन अभिव्यक्ति .बहुत अद्भुत अहसास.सुन्दर प्रस्तुति. दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये आपको और आपके समस्त पारिवारिक जनो को ! मंगलमय हो आपको दीपो का त्यौहार जीवन में आती रहे पल पल नयी बहार ईश्वर से हम कर रहे हर पल यही पुकार लक्ष्मी की कृपा रहे भरा रहे घर द्वार..

    vinitashukla के द्वारा
    November 13, 2012

    हार्दिक धन्यवाद मदन मोहन जी. आपको भी आपके समस्त परिवार के साथ, दीप- पर्व की मंगलकामनाएं.

Tufail A. Siddequi के द्वारा
November 12, 2012

विनीता जी सादर अभिवादन, कितनी ही बातें मथती हैं मन को कई कई बार अंतस के सागर में उमड़ घुमड़ चलते हैं लपटों से जलते हैं अनगिनत विचार… बहुत सुन्दर रचना. बधाई. http://siddequi.jagranjunction.com

    vinitashukla के द्वारा
    November 12, 2012

    अनेकानेक धन्यवाद सकारात्मक टिप्पणी हेतु.

Lahar के द्वारा
November 12, 2012

प्रिय वीनिता जी सप्रेम नमस्कार जीवन की तमाम बाधाओ के बाद भी संघर्ष पूर्वक आगे बढ़ने की प्रेरणा देती ये कविता

    vinitashukla के द्वारा
    November 12, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद आपका, प्रशंसा हेतु.

shashibhushan1959 के द्वारा
November 11, 2012

आदरणीय विनीता जी, सादर ! जीवन पथ की उतार-चढ़ाव भरी स्थितियों का भावपूर्ण वर्णन ! वाकई, यही तो है जीवन ! “”पीड़ा है- दंशन भी मोह है- सम्मोहन भी सर्पिल पगडण्डी सी- जीवन की राहें”" सादर !

    vinitashukla के द्वारा
    November 11, 2012

    आदरणीय शशिभूषण जी, सराहना और प्रोत्साहन के लिए कोटिशः धन्यवाद

yamunapathak के द्वारा
November 9, 2012

पीड़ा है- दंशन भी मोह है- सम्मोहन भी सर्पिल पगडण्डी सी- जीवन की राहें वीनिता जी इन पंक्तियों ने मन मोह लिया

    vinitashukla के द्वारा
    November 10, 2012

    आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद यमुना जी.

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
November 9, 2012

मान्या विनीता जी , सादर अभिवादन !……… एक श्रेष्ठ और सुन्दर नवगीत के लिए हार्दिक बधाई ! पुनश्च !1

    vinitashukla के द्वारा
    November 10, 2012

    बहुत बहुत आभार, रचना को पसंद करने हेतु.

Alka के द्वारा
November 9, 2012

विनीता जी , भावनाओं की सुन्दर अभिव्यक्ति .| सुन्दर रचना के लिए बधाई |आपको ज्योति पर्व की शुभकामनाएं |

    vinitashukla के द्वारा
    November 9, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद अलका जी. आपको भी दीपावली की मंगलकामनाएं.

yogi sarswat के द्वारा
November 8, 2012

यह कैसा मंथन है – अमृत घट रीता है नहीं कोई नीलकंठ अब विष को पीता है आसुरी छलावे से छले देवता जाते कस्तूरी में अटकी हृदय-हरिण की साँसे! कुंठा से बद्ध हुए आकुल उदगार संवेदनाएं अब इस जग में नहीं रही हैं , आपने मन की बात को बहुत ही सरल और सादा शब्दों में व्यक्त किया है ! बहुत ही बढ़िया , उत्क्रष्ट रचना आदरणीय विनीता शुक्ला जी !

    vinitashukla के द्वारा
    November 8, 2012

    सुन्दर शब्दों में सराहना हेतु धन्यवाद योगी जी.

jlsingh के द्वारा
November 8, 2012

आदरणीय विनीता जी, सादर अभिवादन! आपने कितनी ही बातें में बहुत कुछ कह दिया है! बहुत ही उत्कृष्ट, संवेदनात्मक अनुभूति को ब्यक्त करती कविता! सादर!

    vinitashukla के द्वारा
    November 8, 2012

    सराहना एवं उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद जवाहर जी.

bebakvichar, KP Singh (Bhind) के द्वारा
November 7, 2012

विनीताजी जीवन की उलझन और विभिन्न भावों के समेटे हुए बेहद सुंदर रचना….

    vinitashukla के द्वारा
    November 8, 2012

    कोटिशः धन्यवाद आपका.

rekhafbd के द्वारा
November 7, 2012

विनीता जी प्राणों की नौका लहराए विप्लव में उलझा भावों का संसार कितनी …….,अति सुंदर अभिव्यक्ति ,बधाई

    vinitashukla के द्वारा
    November 8, 2012

    रचना को पसंद करने व सराहने हेतु धन्यवाद रेखा जी.

yatindranathchaturvedi के द्वारा
November 7, 2012

अद्भुत,,बधाई स्वीकार करें आदरणीय

    vinitashukla के द्वारा
    November 8, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद.

krishnashri के द्वारा
November 7, 2012

आदरणीय महोदया , सादर , बहुत सुन्दर भावप्रधान रचना के लिए हार्दिक बधाई .

    vinitashukla के द्वारा
    November 8, 2012

    हार्दिक आभार आदरणीय कृष्णश्री जी.

akraktale के द्वारा
November 6, 2012

वाह! कोई एक पंक्ति नहीं पूर्ण रचना ही भावपूर्ण और प्रवाहमय है. हार्दिक बधाई स्वीकारें आद. विनीता जी.

    vinitashukla के द्वारा
    November 7, 2012

    सकारात्मक प्रतिक्रिया व सराहना हेतु, अनेकानेक धन्यवाद अशोक जी.

nishamittal के द्वारा
November 6, 2012

विनीता जी सदा की भांति एक भावपूर्ण रचना पर बधाई ,सुन्दर अभिव्यक्ति यह कैसा मंथन है – अमृत घट रीता है नहीं कोई नीलकंठ अब विष को पीता है आसुरी छलावे से छले देवता जाते कस्तूरी में अटकी हृदय-हरिण की साँसे! कुंठा से बद्ध हुए आकुल उदगार

    vinitashukla के द्वारा
    November 6, 2012

    उत्साह बढाने के लिए अनेकानेक धन्यवाद निशा जी. दीपावली की मंगलकामनाएं.

Santlal Karun के द्वारा
November 5, 2012

“यह कैसा मंथन है – अमृत घट रीता है नहीं कोई नीलकंठ अब विष को पीता है आसुरी छलावे से छले देवता जाते कस्तूरी में अटकी हृदय-हरिण की साँसे! कुंठा से बद्ध हुए आकुल उदगार” संवेदनात्मक उत्कृष्ट कविता; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! ज्योति पर्व की मंगल कामनाएँ !

    vinitashukla के द्वारा
    November 6, 2012

    सुन्दर शब्दों में सराहना हेतु धन्यवाद. आपको भी दीवाली की मंगलकामनाएं.

November 5, 2012

विनीता जी बहुत ही अच्छी प्रस्तुति के लिये आभार

    vinitashukla के द्वारा
    November 5, 2012

    हार्दिक धन्यवाद आदरणीय.

annurag sharma(Administrator) के द्वारा
November 5, 2012

विनीता जी बहुत ही अच्छी प्रस्तुति के लिये आभार ,,,,,,,,,,,,,,,कितनी ही बातें मथती हैं मन को कई कई बार अंतस के सागर में उमड़ घुमड़ चलते हैं लपटों से जलते हैं अनगिनत विचार

    vinitashukla के द्वारा
    November 5, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद आपका.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
November 5, 2012

यह कैसा मंथन है – अमृत घट रीता है नहीं कोई नीलकंठ अब विष को पीता है आदरणीय विनीता जी, सादर अभिवादन आनंदम बधाई. 

    vinitashukla के द्वारा
    November 5, 2012

    सादर नमस्कार आदरणीय कुशवाहा जी. प्रशंसा एवं समर्थन हेतु धन्यवाद.

vikramjitsingh के द्वारा
November 5, 2012

कितनी ही बातें…… कुछ भी कहा तो……और बढ जायेंगी…… इसलिए इतना ही कहेंगे……सुन्दर रचना…….

    vinitashukla के द्वारा
    November 5, 2012

    रचना के भावों को ग्रहण कर, सकारात्मक टिप्पणी देने हेतु धन्यवाद.

alkargupta1 के द्वारा
November 5, 2012

विनीता जी, द्वन्द अंतर्द्वंद में उलझी मनः स्थिति की अति सुन्दर काव्याभिव्यक्ति …..बधाई

    vinitashukla के द्वारा
    November 5, 2012

    प्रोत्साहन एवं सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद अलका जी.

sudhajaiswal के द्वारा
November 5, 2012

आदरणीया विनीता जी, सादर अभिवादन, सार्थक सन्देश देती सुन्दर रचना के लिए बहुत बधाई|

    vinitashukla के द्वारा
    November 5, 2012

    कोटिशः धन्यवाद.

sudhajaiswal के द्वारा
November 5, 2012

आदरणीया विनीता जी, सादर अभिवादन, बहुत ही सुन्दर भाव, सुन्दर रचना के लिए बहुत बधाई|

    vinitashukla के द्वारा
    November 5, 2012

    हार्दिक आभार!


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