Vichar

Just another weblog

51 Posts

1697 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 2472 postid : 336

सिमटा हुआ आसमान

Posted On: 6 Oct, 2012 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

मुझे छूकर
गुजरती यूँ
जीवन की हलचलें -
कोई रेल मानों
पटरियों से गुजरे;
पल पल जोडूं
जीने का सामान
मेरे पास है -
एक सिमटा हुआ आसमान
मैं धुरी हूँ
निष्ठा की
संस्कारों
की वाहक
अन्नपूर्णा
भी मैं
मैं ही
कुनबे की पालक
भूलकर खुद को
जीना नहीं आसान
मेरे ………………..
टिकती जिस पर है
हर परिवार की
इमारत
बुनियाद
वह समाज की
तो गढती
बस औरत
सब हित अपने
कर देती
हंसकर कुर्बान
मेरे ……………..

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (6 votes, average: 2.83 out of 5)
Loading ... Loading ...

48 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Bobbe के द्वारा
October 17, 2016

Hola Esteban, soy fan de robi y renmecteiente me gusta mucho tu propuesta musical me gustaria mucho ir al tributo y escuchar las canciones:mas y mas. reza por mi, cruzando puertas y penelope

Madan Mohan saxena के द्वारा
October 18, 2012

बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये. बहुत सराहनीय प्रस्तुति. बहुत सुंदर बात कही है इन पंक्तियों में. दिल को छू गयी. आभार !

    vinitashukla के द्वारा
    October 19, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद मदन मोहन जी.

MAHIMA SHREE के द्वारा
October 15, 2012

टिकती जिस पर है हर परिवार की इमारत बुनियाद वह समाज की तो गढती बस औरत सब हित अपने कर देती हंसकर कुर्बान…… एक औरत की सच्ची परिभाषा को पूर्ण करती रचना ..बहुत बधाई आदरणीय विनीता जी

    vinitashukla के द्वारा
    October 16, 2012

    अनेकानेक धन्यवाद महिमा जी.

alkargupta1 के द्वारा
October 13, 2012

विनीता जी , अति सुन्दर भावपूर्ण काव्याभिव्यक्ति

    vinitashukla के द्वारा
    October 13, 2012

    प्रोत्साहन हेतु हार्दिक आभार अलका जी.

sudhajaiswal के द्वारा
October 10, 2012

आदरणीया विनीता जी, सादर अभिवादन! बहुत सुन्दर कविता, सुन्दर भाव| हार्दिक बधाई!

    vinitashukla के द्वारा
    October 11, 2012

    उत्साहवर्धक प्रतिकिया के लिए हार्दिक आभार सुधा जी.

seemakanwal के द्वारा
October 10, 2012

मैं धुरी हूँ निष्ठा की संस्कारों की वाहक अन्नपूर्णा भी मैं मैं ही कुनबे की पालक भूलकर खुद को जीना नहीं आसान अति सुन्दर ,हार्दिक बधाई .

    vinitashukla के द्वारा
    October 10, 2012

    सीमा जी, प्रोत्साहन व सराहना के लिए कोटिशः धन्यवाद.

aman kumar के द्वारा
October 10, 2012

समाज के आधार शीला औरत को सत- सत प्रणाम ! अति सुंदर प्रस्तुति !

    vinitashukla के द्वारा
    October 10, 2012

    समर्थन एवं सराहना के लिए आभार अमन जी.

rekhafbd के द्वारा
October 10, 2012

टिकती जिस पर है हर परिवार की इमारत बुनियाद वह समाज की तो गढती बस औरत सब हित अपने कर देती हंसकर कुर्बानअति सुंदर भाव विनीता जी ,हार्दिक बधाई

    vinitashukla के द्वारा
    October 10, 2012

    रचना की संवेदना को ग्रहण कर, सहमति देने हेतु धन्यवाद रेखा जी.

annurag sharma(Administrator) के द्वारा
October 9, 2012

बहुत अच्छी प्रस्तुतिके लिये बधाई

    vinitashukla के द्वारा
    October 9, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद.

Mohinder Kumar के द्वारा
October 9, 2012

विनीता जी, सुन्दर भाव भरी रचना के लिये बधाई… आप ने सच लिखा है कि धूरी रूपी नारी का सारा जीवन सिर्फ़ घर के पहिये को घुमा कर मंजिल तक पंहुचाने में ही व्यतीत हो जाता है… स्वयं के लिये कुछ बचता ही नहीं. लिखते रहिये.

    vinitashukla के द्वारा
    October 9, 2012

    इस विचारशील, सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए आभार मोहिंदर जी.

yogi sarswat के द्वारा
October 9, 2012

मैं धुरी हूँ निष्ठा की संस्कारों की वाहक अन्नपूर्णा भी मैं मैं ही कुनबे की पालक भूलकर खुद को जीना नहीं आसान वास्तविक है यह औरत की परिकल्पना बहुत सुन्दर एवं सार्थक शब्द आदरणीय विनीता शुक्ला जी !

    vinitashukla के द्वारा
    October 9, 2012

    प्रोत्साहन व सराहना के लिए धन्यवाद योगी जी.

surendr shukl Bhramar5 के द्वारा
October 8, 2012

आदरणीया विनीता जी आज कल ये बदली हुयी कला आप की निखर रही है नारियां इसी लिए तो पूज्य हैं अपने को भुलाये हुए सब कुछ कर्तव्य धर्म निभाते हुए हंसकर कुर्बान रहती है दुआ है प्रभु से उन्हें भरपूर प्यार मिले ..आदर और सम्मान मिले . भ्रमर ५

    vinitashukla के द्वारा
    October 9, 2012

    भ्रमर जी, समर्थन और सराहना हेतु आभार.

AJAY CHAUDHARY के द्वारा
October 8, 2012

वास्तविक है यह औरत की परिकल्पना… इसीलिए तो औरत का दर्जा हमेशा ऊँचा रहेगा… सुन्दर!

    vinitashukla के द्वारा
    October 8, 2012

    सुन्दर शब्दों में सराहना के लिए धन्यवाद अजय जी.

yamunapathak के द्वारा
October 8, 2012

विनीता jee इस कविता ने हम सब महिलाओं के bhav ko मुखर कर दिया है. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

    vinitashukla के द्वारा
    October 8, 2012

    नमस्कार यमुना जी; उत्साह बढाने वाली सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
October 8, 2012

बस औरत सब हित अपने कर देती हंसकर कुर्बान मेरे आदरणीया महोदया, सादर अभिवादन आपसे सिखने को भी मिल रहा है, बधाई. 

    vinitashukla के द्वारा
    October 8, 2012

    नमस्कार आदरणीय कुशवाहा जी. आपकी इस सद्भावनायुक्त, उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक धन्यवाद; मैं अभी स्वयम ही आप सबसे सीखने की कोशिश कर रही हूँ, इस योग्य कहाँ कि मंच के सम्मानित सदस्यों को कुछ सिखा सकूं! साभार…

Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
October 8, 2012

आदरणीय विनीता मैम जी,आपकी इस सुन्दर कविता में सशक्त नारी का अदभुत चित्रण देखने को मिल रहा है जो की बहुत ही सुन्दर भाव से आपने अपने शब्दों में पिरोया है, आपको हार्दिक बधाई |

    vinitashukla के द्वारा
    October 8, 2012

    धवलिमा जी, इस सौहार्दपूर्ण, सुंदर प्रतिक्रिया के लिए तहेदिल से धन्यवाद.

Santlal Karun के द्वारा
October 7, 2012

विनीता जी, नव गीत आज-कल की फिल्मों के गानों-जैसा आधुनिक तरन्नुम वाला और भावों को परोसने की वर्तमान शैली में कुल मिलाकर एक विशिष्ट प्रभाव छोड़ता है, हार्दिक साधुवाद !

    vinitashukla के द्वारा
    October 8, 2012

    रचना के भावों को ग्रहण कर, सहमति प्रदान करने हेतु धन्यवाद आ. संतलाल जी.

अजय यादव के द्वारा
October 7, 2012

nice……….बस औरत सब हित अपने कर देती हस कर कुरबान ………….सुंदर भावा व्यक्ति

    vinitashukla के द्वारा
    October 8, 2012

    सकारात्मक टिप्पणी के लिए आभार अजय जी.

akraktale के द्वारा
October 7, 2012

विनीता जी                सादर, नारी विडंबना पर लिखी सुन्दर प्रस्तुति. बधाई स्वीकारें.

    vinitashukla के द्वारा
    October 8, 2012

    प्रोत्साहन व सराहना के लिए धन्यवाद अशोक जी.

manoranjanthakur के द्वारा
October 7, 2012

बहुत सुंदर भाव समेटे .. दिल को टटोल गई .. बहुत बधाई

    vinitashukla के द्वारा
    October 7, 2012

    सुंदर शब्दों में सराहना के लिए, आभार मनोरंजन जी

shashibhushan1959 के द्वारा
October 7, 2012

आदरणीय विनीता जी, सादर ! “”पल पल जोडूं जीने का सामान मेरे पास है – एक सिमटा हुआ आसमान”" बहुत सुन्दर पंक्तियाँ ! सचमुच प्रत्येक नारी अपनी गृहस्थी को ऐसे ही तिनका-तिनका जोड़कर एक सुन्दर स्वर्गिक रूप देती है ! सादर !

    vinitashukla के द्वारा
    October 7, 2012

    आदरणीय शशिभूषण जी, आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए कोटिशः आभार.

nishamittal के द्वारा
October 6, 2012

औरत की सही तस्वीर प्रस्तुत करती रचना विनीता जी.प्रभावी पंक्तियाँ मैं धुरी हूँ निष्ठा की संस्कारों की वाहक अन्नपूर्णा बनकर करती कुनबे की खिदमत भूलकर खुद को जीना नहीं आसान

    vinitashukla के द्वारा
    October 6, 2012

    त्वरित और सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद निशा जी.

    jlsingh के द्वारा
    October 6, 2012

    मैडम निशा जी की बातों से सहमत! इसमें कोई दो राय नहीं ….

    vinitashukla के द्वारा
    October 7, 2012

    सहमति हेतु आभार जवाहर जी.


topic of the week



latest from jagran