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मातृसत्ता बनाम पितृसत्ता

Posted On: 21 Aug, 2012 Others में

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देश के मातृसत्ता वाले राज्यों का सच
हमारे राष्ट्र के अधिकतर प्रान्तों में कुटुंब का मुखिया पुरुष ही होता है. पुरुष के नाम से ही वंश चलता है. पैतृक संपत्ति पर अधिकतर, परिवार के बेटों का ही कब्जा होता है. बेटियाँ तो दहेज़ की एकमुश्त रकम देकर विदा कर दी जाती हैं. फिर तो उनका पारिवारिक व्यवसाय, जमीन और जायदाद आदि से कोई वास्ता नहीं रह जाता. कहीं कहीं अपवाद भी हो सकते हैं; पर समाज की मानसिकता और प्रतिबद्धता, इसी मान्यता को पुष्ट करती है.

आज मैं, देश के दो ऐसे प्रमुख राज्यों की चर्चा करना चाहूंगी जहां ‘कथित’ तौर पर मातृसत्ता का बोलबाला है. ये हैं केरल और मेघालय. पिछले सत्रह सालों से केरल में हूँ. यहाँ का समाज कुछ मामलों में बहुत उन्नत है. लोग अपेक्षाकृत ईमानदार और योजनाबद्ध तरीके से काम करने वाले हैं. जहां तक मातृसत्ता का सवाल है; सामाजिक जीवन के कुछ पहलुओं में यह अवश्य झलकती है. यथा- परिवार में कन्या शिशु का जन्म शुभ माना जाता है, स्त्रियों को शिक्षा एवं विकास के समान अवसर प्रदान किये जाते हैं. दहेज़- हत्याएं अथवा उत्पीडन सुनने में नहीं आते. माता- पिता विवाहित बेटी के घर भी, निःसंकोच होकर रह सकते हैं. पर इस मातृसत्ता की पृष्ठभूमि में, अतीत का एक काला चेहरा भी है, जो कईयों ने नहीं देखा.

बरसों पहले, यहाँ की दो प्रमुख जातियों नम्बूदरी (ब्राह्मण) एवं नायर के मध्य; एक सर्वमान्य अनुबंध हुआ करता था. इसके तहत, नम्बूदरी जाति के पुरुष बेखटके; कुँवारी नायर कन्याओं के साथ शारीरिक सम्बन्ध बना सकते थे (बिना वैवाहिक बंधन में बंधे हुए). उन कन्याओं के परिवारवाले, इसे बहुत अच्छा मानते थे; क्योंकि उनका सोचना था कि इस प्रकार जो संतान जन्म लेगी, वह बहुत बुद्धिमान और योग्य होगी(पिता के उच्चजाति नम्बूदरी से होने के कारण). उस संतान को पिता का नाम नहीं दिया जा सकता था, इसलिए वंश को माँ के नाम से ही चलाना पड़ता था. परन्तु इससे समाज में बहुत अनाचार फैलने लगा. नम्बूदरी पुरुष उच्छ्रन्खल होते गये. क्योंकि उनकी जाति में परिवार के बड़े बेटे को ही कानूनी विवाह( वेळी) की अनुमति थी. परिवार के अन्य बेटे नायर एवं अन्य निचली जातियों की कन्याओं से दैहिक सम्बन्ध( सम्बन्धम या वैकल्पिक विवाह के तहत) बना सकते थे. इस प्रकार नम्बूदरी कन्याओं के लिए वरों की कमी होने लगी. उन युवतियों को या तो ‘वेळी’ के तहत ऐसे अधेड़ पुरुष से विवाह करना पड़ता, जिसका पहले भी कई बार विवाह हो चुका हो या फिर ताउम्र कुँवारी रहना पड़ता. नम्बूदरी पुरुषों को, नारी के उपभोग का अवसर लगातार मिलता रहा; वहीँ उनकी स्त्रियों को केवल एक बार ही विवाह की अनुमति थी. ‘सम्बन्धम’ द्वारा जो सम्बन्ध नम्बूदरी पुरुष और नायर स्त्री के बीच बनता, उसे कुछ साधारण रीतियों से एक झटके में समाप्त किया जा सकता था. यह पुरुष, नित नयी कन्याओं को भोगने के लिए स्वतंत्र थे. नम्बूदरी तथा नायर स्त्रियों की दशा शोचनीय होती गयी. इस प्रथा के मूल में, मातृसत्ता की आड़ में; नारी का दैहिक शोषण ही तो था. कालांतर में इस प्रथा को बंद कर दिया गया. परन्तु क्या इस पर आधारित, मातृसत्ता की अवधारणा सही ठहराई जा सकती है?

अतीत के साथ साथ, वर्तमान की भी कुछ चर्चा कर ली जाये. यहाँ घरेलू नौकरानियाँ व मजदूर औरतें भी थोडा- बहुत पढ़ी- लिखी होती है( प्रांत में सौ प्रतिशत साक्षरता होने के कारण). बेरोजगारी की समस्या व उनकी शिक्षा का स्तर कमतर होने के कारण, कोई अन्य (सम्मानजनक) कार्य वे कर भी नहीं सकतीं. उनमें से कुछ (मुस्लिम स्त्रियाँ), १४ से १६ वर्ष की उम्र में ब्याह दी जाती हैं. उनके पति छोटे- मोटे व्यवसायों या नौकरियों में होते हैं ( आटो रिक्शा चालन, बढईगिरी, श्रमिक, मैकनिक आदि). इन पढ़े- लिखे युवकों को, यह छोटे- मोटे काम रास नहीं आते और वे अक्सर सब छोड़छाड कर घर बैठ जाते हैं. उनका काम बस शराब पीने और कमाऊ बीबी पर हाथ उठाने तक सीमित रह जाता है. घरेलू हिंसा में केरल का स्थान, राजस्थान के बाद दूसरा है. शराबखोरी और पारिवारिक विघटन आदि के चलते, आत्महत्या के मामलों में भी; यह प्रांत शीर्ष स्थान पर है.

अब बात करें मेघालय की. यहाँ वंश परिवार की छोटी पुत्री के नाम पर चलता है. अधिकार और हैसियत कहने को तो उनके पास हैं पर गत वर्षों में लगभग, ५२ घरेलू हिंसा के मामले दर्ज़ हुए हैं; जिसका मुख्य कारण शराबखोरी बताया गया है. यह निष्कर्ष, नॉर्थ ईस्ट नेटवर्क नामक महिला संगठन द्वारा किये गये अध्ययन से निकाला गया है. संगठन की निदेशक मनीषा बहल के अनुसार,’इस प्रकार की घटनाओं की संख्या दिनबदिन बढ़ती जा रही है. ग्रामीण इलाकों की स्थिति बदतर है. रिपोर्ट करने के बजाय, आपसी सुलह द्वारा बात को दबा देना ही श्रेयस्कर माना जाता है.’

वरिष्ठ महिला पुलिस अधिकारी, आई नोंगरांग के अनुसार, ‘ पिछले ३१ सालों में, विधायक बनने वाली महिलाओं की संख्या नगण्य है. महिला पुलिस-बल के गठन का अधिकार भी पुरुषों के हाथ में है. यह मातृसत्ता का एक अँधेरा पहलू है.’

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30 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

dineshaastik के द्वारा
August 24, 2012

आदरणीय विनीता जी, सादर नमस्कार। बहुत ही गंभीर विषय पर जानकारी देता हुआ सराहनीय आलेख। हमारे समाज का घृणित काला चेहरा दिखाता हुआ आलेख। कुछ विद्वान लोंगो ने अपना विलासता के लिये समाज के लिये बहुत से अमानवीय नियम बना दिये और उन्हें धर्म का नाम दे दिया जिससे किसी का विरोध करने का साहस न हो। यदि कोई इनका विरोध करने का साहस करता है तो उसे तरह तरह से प्रताडित करते है। अपमानित करते हैं, तरह तरह की गालियों से अलंकृत करते हैं, विदेशी ऐजन्ट  करार देते हैं, आतंकवादी कह देते हैं। यहाँ तो उन्हें जानसे मारने का फतवा भी जारी कर देते हैं। लेकिन हमें इनकी धमकियों से न डर कर ऐसी कुप्रथाओं का विरोध करना चाहिये। http://dineshaastik.jagranjunction.com/2012/08/21/ज्योतिषी-जी-एवं-ओझा-जी-की-प/

    vinitashukla के द्वारा
    August 24, 2012

    सच कहा आपने, मानवता से बड़ा कोई धर्म नहीं और जो धर्म इसका दमन करता हो; वह धर्म कहलाने लायक नहीं. विचारशील और विस्तृत प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद.

vikramjitsingh के द्वारा
August 23, 2012

विनीता जी….सादर….. एक कड़वा सत्य….. एक विचारणीय आलेख……लेकिन अभी भी कुछ पहलु अनछूए ही रह गए…… सादर…….

    vinitashukla के द्वारा
    August 23, 2012

    मेरे ब्लॉग पर आने तथा अपने विचार व्यक्त करने हेतु धन्यवाद विक्रमजीत जी.

August 23, 2012

एक बेहतरीन लेख और विचारधारा के लिय मेरा हार्दिक अभिनन्दन स्वीकारें !

    vinitashukla के द्वारा
    August 23, 2012

    प्रोत्साहन हेतु आभार हिमांशु जी.

yogi sarswat के द्वारा
August 23, 2012

आदरणीय विनीता शुक्ल जी , सादर नमस्कार ! बहुत ही बढ़िया और जानकारी से भरा लेख दिया आपने ! स्वागत एवं बधाई ! बहुत बहुत धन्यवाद ! इस मंच में ज्यादातर लोग उत्तर भारत से हैं , इसलिए केरल जैसे राज्य के विषय में जान पाना या मेघालय के विषय में बात करना मुश्किल हो जाता है ! किन्तु मेरा सौभाग्य है की मेघालय के जीवन को कुछ दिनों समझने का मौका मिला है ! बहुत नयी जानकारी मिली ! आपको सम्मान सहित अपने ब्लॉग पर आमंत्रित करना चाहता हूँ ! http://yogensaraswat.jagranjunction.com/2012/07/23/इन-मासूमों-का-क्या-दोष

    vinitashukla के द्वारा
    August 23, 2012

    सुंदर शब्दों में सराहना हेतु धन्यवाद योगी जी.

Chandan rai के द्वारा
August 23, 2012

विनीता जी , एक बेहतरीन लेख और विचारधारा के लिय मेरा हार्दिक अभिनन्दन स्वीकारें ! चंद बेहतरीन लेखों में से एक !

    vinitashukla के द्वारा
    August 23, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद चन्दन जी.

akraktale के द्वारा
August 22, 2012

विनीता जी सादर नमस्कार, आपने एक नयी जानकारी दी है यहाँ मंच पर दक्षिण भारत के कम ही लोग हैं इसलिए वहाँ के रीती रिवाज कि अधिक जानकारी नहीं मिल पाती. हाँ केरल सर्वप्रथम सम्पूर्ण साक्षर प्रदेशों में गिना जाता है और देश का एक मात्र प्रदेश जों कन्या बहुल है.दक्षिण से देवदासी प्रथा के बारे में तो कुछ जानकारी थी किन्तु नम्बूदरी और नायर वाली जानकारी नहीं थी. अवश्य ही जब कभी इस परम्परा कि शुरुआत हुई होगी तो कुछ इसका उद्देश्य रहा होगा किन्तु कालांतर में जों घृणित रूप इसका आपने वर्णित किया है वह कदापि ठीक नहीं कहा जा सकता. मेघालय के बारे में भी आपने लिखा है. स्थिति वहाँ भी ठीक नहीं है किन्तु इसके कारण हम मात्सत्तात्मकता को असफल कहें यह ठीक नहीं है. इसके कुछ अच्छे परिणाम भी हैं जैसे लडकी भूर्ण कि ह्त्या जैसे अपराध ना होना. आपने एक नए और अच्छे विषय पर बहुत अच्छा लिखा है. आपका हार्दिक अभिवादन.

    vinitashukla के द्वारा
    August 23, 2012

    कोटिशः धन्यवाद अशोक जी.

phoolsingh के द्वारा
August 22, 2012

विनीता जी, एक कटू सत्य को उजागर करता सार्थक लेख…बहुत ही सुंदर सदा यूँ ही लिखते रहिये . फूल सिंह

    vinitashukla के द्वारा
    August 22, 2012

    सद्भावना युक्त टिपण्णी हेतु धन्यवाद फूल सिंह जी.

jlsingh के द्वारा
August 22, 2012

विनीता जी, नमस्कार! आपने दोनों राज्यों का कटु सत्य सामने रक्खा है. जहाँ तक मैं समझा पाया हूँ- स्त्रियाँ यानी महिलाएं प्राकृतिक रूप से कमजोर होने के कारन हमेशा अभिशप्त रही हैं. शराबखोरी महिलाओं पर होने वाले अपराधों में बृद्धि का कारक है. साक्षरता दर में अव्वल होने पर भी केरल शराबखोरी में लिप्त है. इस बुराई को जड़ से समाप्त करने की जरूरत है. शिक्षा और जागरूकता दोनों जरूरी है. महिलाओं को ज्यादा सचेत रहने की जरूरत है और अपना हक़ लेने में संकोच कैसा? आभार और बधाई!

    vinitashukla के द्वारा
    August 22, 2012

    विचारशील प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद जवाहर जी.

Rajkamal Sharma के द्वारा
August 21, 2012

माफ़ी चाहता हूँ की जाने क्यों ऐसा लग रहा है की आपने बहुत सी जानकारिया देने में कंजूसी बरती है हो सकता है यह की मेरा वहम हो मेरा मन और दिल मांगे मोर आभार सहित मुबारकबाद

    vinitashukla के द्वारा
    August 22, 2012

    आप किस जानकारी की बात कर रहे हैं राजकमल जी? मैं कुछ समझी नहीं. सराहना एवं बधाई के लिए धन्यवाद.

nishamittal के द्वारा
August 21, 2012

विनीता जी बहुत दिन पश्चात मंच पर आपका आगमन सुखद लगा.जानकारी के लिए आभार .केरल साक्षरता में प्रथम माना जाता है परन्तु व्यवहारिक जानकारी आपसे प्राप्त कर ज्ञान वर्धन हुआ.

    vinitashukla के द्वारा
    August 21, 2012

    कोटिशः धन्यवाद निशा जी.

    nishamittal के द्वारा
    August 24, 2012

    विनीता जी केरल में विवाह संस्कार के संदर्भ में परम्पराओं के विषय में कुछ भ्रांत जानकारी है यदि संभव हो तो कृपया आप लिखें

    vinitashukla के द्वारा
    August 24, 2012

    निशा जी, कदाचित आप ‘वेळी’ और ‘सम्बन्धम’ की बात कर रही हैं. ‘वेळी’ अर्थात ‘वैध विवाह’ जबकि ‘सम्बन्धम’ मात्र विवाह की एक वैकल्पिक व्यवस्था थी. ‘वेळी’ की अनुमति (नम्बूदरी सम्प्रदाय में) परिवार के बड़े बेटे को ही होती थी. यह संबंध अपनी जाति की कन्या से ही जोड़ा जाता था. इस बंधन में बंधकर, पुरुष अपनी सहचरी व उससे उत्पन्न संतान के पालन- पोषण व उनके हितों की रक्षा की लिए उत्तरदायी होता था. दैहिक क्षुधा को शांत करने हेतु नम्बूदरी परिवार के अन्य पुत्र, नायर व अन्य निचली जाति की युवतियों के साथ ‘सम्बन्धम’ के तहत संबंध बना लेते. इसमें वह अपनी सहचरी या अपनी संतान के प्रति किसी भी प्रकार के दायित्व से मुक्त होते थे.( वह अपने पिता के घर ही रहती. उसे अपने सहचर के निवास पर जाने की अनुमति नहीं थी.) इस ‘अनुबंध’ को सामान्य अनुष्ठान द्वारा समाप्त किया जा सकता था और उस स्त्री से फिर उनका कोई वास्ता न रहता. उस कन्या को वे अपने घर नहीं ले जा सकते थे. यहाँ तक कि उसके साथ समय बिताने के बाद, वे अपना ‘शुद्धिकरण’ करते और तभी अपने घर जा सकते थे. इस प्रकार वे अनेक स्त्रियों से सम्बन्ध बना लेते. यहाँ तक कि कमसिन बालाओं का शोषण, अनाकर्षक वृद्ध कर लेते. उन कन्याओं के अभिभावक इसे ‘ईश्वरीय वरदान’ मानकर, सहर्ष इसकी अनुमति दे देते. इधर नम्बूदरी युवतियों की स्थिति भी कुछ ठीक न थी. उनके लिए वरों की भारी कमी थी(नम्बूदरी परिवारों में बस बड़े बेटे को ही विवाह की अनुमति होने के कारण). उन्हें प्रायः ‘वेळी’ के तहत एक ऐसे वृद्ध पुरुष से ब्याह करना पड़ता, जिसके पहले भी कई विवाह हो चुके हों, या फिर उम्र भर कुँवारी रहना पड़ता. ये पुरुष तो कई बार विवाह कर लेते पर इनकी स्त्रियों को सिर्फ एक बार विवाह की अनुमति थी.

himanshu के द्वारा
August 21, 2012

सार्थक लेख…समाज का बास्तविक चेहरा यही है

    vinitashukla के द्वारा
    August 21, 2012

    सराहना के लिए धन्यवाद हिमांशु जी.

Mohinder Kumar के द्वारा
August 21, 2012

विनीता जी, एक कटू सत्य को उजागर करता सार्थक लेख… लिखते रहिये.

    vinitashukla के द्वारा
    August 21, 2012

    प्रोत्साहन के लिए आभारी हूँ. धन्यवाद.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
August 21, 2012

आदरणीया विनीता जी, सादर अभिवादन बहुत सुन्दर जानकारी दी, तथ्यों से अवगत हुआ. बधाई.

    vinitashukla के द्वारा
    August 21, 2012

    आदरणीय कुशवाहा जी, सादर प्रणाम. सकारात्मक प्रतिक्रिया हेतु आभार.

manoranjanthakur के द्वारा
August 21, 2012

समाज का बास्तविक चेहरा यही है सुंदर अविवाक्ति बधाई

    vinitashukla के द्वारा
    August 21, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद.


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