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कुछ उदगार मन के

Posted On: 6 Aug, 2011 में

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१- तरकश
………………..
माना कि तुम्हारे तरकश में हैं
पैनी सच्चाइयों के तीर
और तुम आमादा हो
वार करने पर
ताकि दे सको
हर विफलता को भूल का नाम;
कठघरे में खड़ा कर सको
बिखरते वज़ूद की कराहटों को
और लानत भेज सको -
सहमी हुई सम्वेदनाओं को
लेकिन कभी सोचा;
क़ि ऐसा करने से -
पुतेगी कालिख ;
तुम्हारे भी नाम पर
क्योंकि हमारे तार
उलझ गए थे आपस में,
कहीं न कहीं -
जाने अनजाने!

२-
कुछ शब्द नहीं हैं मेरे शब्दकोष में
…………………………………
वह जो आदमी -
बीनता रोटी के टुकड़े,
मंडरा रहा कचरे के ढेर पर
वो औरत जो-
थिरकती महफ़िलों में;
अपने जमीर से मुंह फेरकर
इनकी विवशता का कोई नाम नहीं
इन्हें देख-
पथरा गयी अभिव्यक्ति
सुन्न सी अनुभूति ;
बेचारगी है रोष में ………….
कुछ शब्द नहीं हैं मेरे शब्दकोष में !

३-
चलो सुने मौन का संगीत
………………………………..
चलो सुने मौन का संगीत
थामकर विचार–मंथन,
और मन की उथल–पुथल
क्षितिज की ताम्बई आभा –
को देखें बस अविकल
उन शान्त लम्हों में
जब पड़े सुनायी,
भोर की शहनाई-
सरसरा उठे पवन
लहरों में हो कम्पन ;
डाल डाल फूट पड़े
कोयल का गीत
चलो सुने मौन का संगीत

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26 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Gump के द्वारा
October 17, 2016

JÃutetg¤lligt bord! Jag bloggar ocksÃ¥ frÃ¥n en bärbar dator. Antingen stÃ¥r den pÃ¥ köksbänken eller ocksÃ¥ sitter jag och bloggar i soffan.Kram Marie

Santosh Kumar के द्वारा
September 15, 2011

आदरणीय विनीता जी ,सादर प्रणाम ..किन्ही कारणों से मैं इन रचनाओ को पहले नहीं पढ़ पाया ,..क्षमा करें क्या तारीफ़ करूं ,..शायद इस लायक नहीं हूँ ,…कभी कभी शब्द वास्तव में नहीं होते ,..सिर्फ भावनाए होती हैं ,..हार्दिक आभार

    vinitashukla के द्वारा
    September 16, 2011

    देर ही से सही, आपने मेरी रचना को समय तो दिया. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद.

abodhbaalak के द्वारा
September 15, 2011

विनीता जी बड़े ही खूबसूरत अंदाज़ में, मन को छू जाने वाली आपकी एक और रचना….. मौन का संगीत ……………. बड़ा ही दिलकश होया है …… क्षमा चाहता हूँ की वय्वास्ता के कारण इस पोस्ट पर अपनी ….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    vinitashukla के द्वारा
    September 16, 2011

    धन्यवाद अबोध जी, आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए.

Rajkamal Sharma के द्वारा
September 7, 2011

आदरणीय विनीता जी ….सादर अभिवादन ! जिस बात का मेरे मन में डॉ तथा आखिरकार वोही सच हुआ ….. आपकी यह बेहतरीन रचना मुझसे पढ़े बिना रह गई थी …… एक बार पहले भी मुझको कुछ ऐसा महसूस हुआ था लेकिन पूछते -२ रह गया था …..आपकी कोई रचना काफी ढूंडने पर भी नहीं मिली थी ….. यकीनन यही थी वोह रचना जिसको मैं पहले भी ढूंड रहा था ….. और जहाँ तक कालिख की बात है तो आजकल इन सब बातो की प्रवाह कौन करता है ….. लेकिन आने वाला समाज में बदलाव इस दिशा में जाता दिखाई दे रहा है की अब ज्यादातर ऐसे लोगो को उनकी करनी का फल जरूरू मिलेगा ….. धन्यवाद सहित इस रचना पर तिहरी बधाई

    Vinita Shukla के द्वारा
    September 7, 2011

    इस सद्भावना भरी, सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए, कोटिशः धन्यवाद राजकमल जी.

संदीप कौशिक के द्वारा
August 18, 2011

आदरणीया विनीता जी, सादर अभिवादन ! हर रचना दिल को छूती हुई सी….! और “शब्द नहीं हैं……” के लिए तो मेरे पास भी……. :) बहुत-बहुत आभार आपका इन्हें मंच पर साझा करने के लिए…..!!

    vinitashukla के द्वारा
    August 28, 2011

    सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद.

    संदीप कौशिक के द्वारा
    September 8, 2011

    आदरणीया विनीता जी, सादर प्रणाम ! पिछले काफी दिनों से आपकी कोई रचना इस मंच पर नहीं आई है । इंतज़ार रहता है, कृप्या इस इंतज़ार को और लंबा…..!! :) और इन दिनों तो मेरे ब्लॉग पर भी आपकी दस्तक…..कहीं मुझ नादान से कोई भूल…..??? :(

    vinitashukla के द्वारा
    September 9, 2011

    ऐसी कोई बात नहीं है संदीप. व्यस्तता के कारण मंच को समय नहीं दे पाई. कोशिश करूंगी, कुछ नया पोस्ट करने की; और आपके ब्लॉग को ढूंढ़कर, उस पर दस्तक भी अवश्य दूंगी! सद्भावना के लिए धन्यवाद.

Baijnath Pandey के द्वारा
August 9, 2011

आदरणीया विनीता जी सादर अभिवादन आपकी कवितायेँ ह्रदय में गहरी उतर जाती है | शायद उतनी हीं भीतर से प्रवाहित होती हैं | अनुपम भावाभिव्यक्ति | बधाई एवं चरणस्पर्श |

    Vinita Shukla के द्वारा
    August 10, 2011

    बहुत दिनों बाद आपकी प्रतिक्रिया मिलने पर अच्छा लगा. धन्यवाद.

alkargupta1 के द्वारा
August 8, 2011

विनीता जी , अनुपम भावाभिव्यक्ति !

    vinitashukla के द्वारा
    August 8, 2011

    बहुत बहुत धन्यवाद अलका जी.

Ramesh Bajpai के द्वारा
August 7, 2011

आदरणीय विनीता जी बहुत ही निराले अंदाज में गहराई से निकले ये उदगार लाजबाब है | बहुत बहुत बधाई |

    Ramesh Bajpai के द्वारा
    August 7, 2011

    कृपया ” आदरणीया” पढ़े

    Vinita Shukla के द्वारा
    August 7, 2011

    आपका कोटिशः धन्यवाद रमेश जी.

surendra shukla Bhramar5 के द्वारा
August 6, 2011

आदरणीया विनीता शुक्ला जी -तीनों रचनाएँ तीन तरह की रंग बिखेरती -सुन्दर सन्देश -सुन्दर प्रकृति का चित्रण निम्न पंक्ति बहुत कुछ कह गयी – वह जो आदमी – बीनता रोटी के टुकड़े, मंडरा रहा कचरे के ढेर पर वो औरत जो- थिरकती महफ़िलों में; अपने जमीर से मुंह फेरकर इनकी विवशता का कोई नाम नहीं काश इसका भी कुछ इलाज जो … शुक्ल भ्रमर ५

    Vinita Shukla के द्वारा
    August 6, 2011

    उत्साह बढ़ाने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद आपका भ्रमर जी.

shaktisingh के द्वारा
August 6, 2011

लाजवाब लेख के लिए आपको बधाई

    Vinita Shukla के द्वारा
    August 6, 2011

    शुक्रिया.


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