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तुम तो ऐसी न थीं

Posted On: 12 Jul, 2011 में

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क्या हुआ है तुम्हें ?

तुम तो ऐसी न थीं-

मेरी प्रिय सखी

तुम्हारे अन्दर

जलती थी जो आग

देख न सकती थी

वह कुछ भी गलत होते हुये

सदा उठ खड़ी होतीं थीं-

तुम जुल्म के खिलाफ

क्या हुआ है तुम्हें ?

कल फहरातीं थीं

जो परचम नारी समानता के

आज क्यों धुंधला गयी -

तुम्हारी वो पहचान?

तुम तो दे देतीं थीं

अपनी मिठाई भी -

चुपके से माली की बिटिया को

क्या हुआ है तुम्हें ?

देखकर भी अब ,

नहीं देखतीं गरीब मुनिया को

सुना था;

सागर में मिलने के बाद

नदी खारी हो जाती है

जाना न था;

कि शादी के बाद-

मिट जाता है औरत का वजूद

पति का रसूख झलक रहा है

मुल्लमे सा, तुम्हारे चेहरे पर

क्या हुआ है तुम्हें?-

कि तुमको छूता न था-

कभी झूठा अभिमान

चापलूसी से था

नहीं कोई सरोकार

‘उनके’ अधिकारी की पत्नी

के सम्मुख

झुक जाती हो

बारम्बार

क्या हुआ है तुम्हें ?

कहाँ गया तुम्हारा ‘नारी स्वाभिमान’ ?

तुम तो ऐसी न थीं -

मेरी प्रिय सखी!
(मेरी एक पुरानी, संशोधित रचना)

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22 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Kaydence के द्वारा
October 17, 2016

No, I am not resident of Memphis and my question about the bible stems from the fact that I read bible first time when I was seven years old and from that day on, I have been agnostic. Bible as a literary work is a remarkable piece of work but apart the golden rule, the religion it offers is very violent, demands sujugbation and lacks humaneness.

neelamsingh के द्वारा
July 23, 2011

विनीता जी भावपूर्ण रचना , बदलाव होना तो चाहिए पर ऐसा भी नहीं कि हम पहचाने ही न जाएँ , विवाह के बाद आमूल – चूल परिवर्तित हो जाने वाली स्त्रियों से अच्छा सवाल किया है आपने | बधाई !

    vinitashukla के द्वारा
    July 24, 2011

    .प्रतिक्रिया से मन हर्षित हुआ. धन्यवाद

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
July 12, 2011

आदरणीया विनीता जी बहुत खूब न जाने कहाँ खो जाता है वह स्वभाव नारीत्व सब कुछ बदलना नहीं चाहिए पर हालात … चापलूसी से था नहीं कोई सरोकार ‘उनके’ अधिकारी की पत्नी के सम्मुख झुक जाती हो बारम्बार क्या हुआ है तुम्हें ?

    Vinita Shukla के द्वारा
    July 12, 2011

    भ्रमर जी, रचना पर उत्साह बढ़ाने वाली प्रतिक्रिया देने के लिए आभार.

alkargupta1 के द्वारा
July 12, 2011

विनीता जी , नारी मन की बहुत ही सुन्दर भावाभिव्यक्ति !

    Vinita Shukla के द्वारा
    July 12, 2011

    सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत धन्यवाद अलका जी.

atharvavedamanoj के द्वारा
July 12, 2011

आदरणीय विनीता जी… अत्यंत ही भावप्रवण रचना विनीता जी| कोटिशः साधुवाद और बधाइयाँ|लगता ही नहीं जैसे रचना पुरानी हो|जय भारत, जय भारती|

    Vinita Shukla के द्वारा
    July 12, 2011

    उत्साहवर्धन के लिए आभारी हूँ.

    Vinita Shukla के द्वारा
    July 13, 2011

    मनोज जी, आपकी पोस्ट पर कमेन्ट नहीं जा पा रहा है. शायद कोई तकनीकी समस्या है.

rajkamal के द्वारा
July 12, 2011

आदरणीय विनीता जी …..नमस्कार ! सच में ही एक नारी की व्यथा और हालात तथा उसमे आये बदलावों को एक दूसरी नारी ही बेहतर तरीके से समझ सकती है …. इसलिए इस मामले में मैं अपनी दो सो प्रतिशत सहमती आदरनीय निशा जी के साथ रखता हूँ …. धन्यवाद :) :( ;) :o 8-) :|

    Vinita Shukla के द्वारा
    July 12, 2011

    बहुत बहुत धन्यवाद राजकमल जी.

meenakshi के द्वारा
July 12, 2011

विनीता जी नमस्ते , निष्ठावान भारतीय नारी की यही पहचान है -प्रत्यक्ष रूप से लोगों को यह भ्रम पैदा हो जाता है कि- ‘नारी ने अपना स्वाभिमान खो दिया’ परन्तु अप्रत्यक्ष रूप से उसका ” स्वाभिमान ” उसका सम्मान दुगना बढ़ जाता है. उसका अस्तित्व और ज्यादा मज़बूत हो जाता है. ” जैसे -हरी घास ” जितना भी झुके अपना अस्तित्व कायम रखती है ; खोती नहीं . बधाई हो भावपूर्ण रचना के लिए. मीनाक्षी श्रीवास्तव

    Vinita Shukla के द्वारा
    July 12, 2011

    सिक्के का दूसरा पहलू प्रस्तुत करने के लिए आपका धन्यवाद मीनाक्षी जी.

allrounder के द्वारा
July 12, 2011

विनीता जी, शब्दों की अच्छी अव्भिव्यक्ति पर आपको बधाई !

    Vinita Shukla के द्वारा
    July 12, 2011

    आपका कोटिशः धन्यवाद सचिन जी.

nishamittal के द्वारा
July 12, 2011

बहुत सुन्दर रचना विनीता जी,नारी क्या पुरुष क्या समय के साथ परिवर्तन तो सबमें आता है,परन्तु नारी परिवार अपने पति बच्चों की आवश्यकताओं के अनुरूप अपनी पुरानी प्रवृत्तियों के विपरीत स्वयं को बदल लेती है.

    Vinita Shukla के द्वारा
    July 12, 2011

    आपकी इस विचारशील प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद निशाजी.


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