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vinitashukla


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आँखें खोलो गांधारी

Posted On: 28 Apr, 2013  
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यौन शिक्षा की आवश्यकता- जागरण जंक्शन फोरम

Posted On: 20 Feb, 2013  
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नागफनी

Posted On: 19 Jan, 2013  
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भारतीय समाज और चारित्रिक पतन

Posted On: 5 Jan, 2013  
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नारी जीवन में वर्जनाओं की भूमिका

Posted On: 22 Dec, 2012  
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चरण- स्पर्श (लघुकथा)

Posted On: 17 Dec, 2012  
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देश के नाम- कुछ भावोद्गार

Posted On: 21 Nov, 2012  
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कितनी ही बातें…..

Posted On: 5 Nov, 2012  
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सिमटा हुआ आसमान

Posted On: 6 Oct, 2012  
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एक थी तात्री (केरल की ऐतिहासिक कथा)

Posted On: 6 Sep, 2012  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा:

के द्वारा: vinitashukla vinitashukla

के द्वारा: vinitashukla vinitashukla

विनीता बेटी आपके इस सुंदर निबंध के लिए आपको मेरा साधुवाद| भारतीय समाज में मर्यादा का पालन एक बहुत महत्वपूर्ण क्रिया रही है| इसी प्रकार भारतीय समाज में व्यक्तिवाद व औसत भारतीय में विशिष्ठ के ब्रह्मदंड का आचरण हमारी सनातन संस्कृति की अनुपम देन हैं| आज जब समाज में भ्रष्टाचार और अनैतिकता का घिनौना तांडव चल रहा है, वैश्विक दृष्टी से ऐसी स्थिति केवल अभिशाप बन कर रह गई है| “कबीरा तेरी झोंपरी गल कटियन के पास, करनगे सो भरन्गे, तू क्यूँ भयो उदास!” अवश्य ही समाज में व्यक्तिवादी विचार है| पाश्चात्य संभ्यता में व्यक्तिवादी नहीं, संगठित समाज द्वारा “गल कटियन” को तुरंत दंडित किया जाता है| घर में माता पिता और घर के बाहर धार्मिक व सामाजिक संस्थाएं यदि मनुष्य को बचपन से ही मर्यादा का पाठ पढाएं तो मनुष्य में आत्मसंयम द्वारा समाज की हर प्रकार की बुराईयों को दूर किया जा सकता है| इसके अतिरिक्त, मनुष्य के चंचल चरित्र पर प्रभावी अंकुश लगाये रखने हेतु प्रायश्चित व दंड का उचित प्रावधान बहुत आवश्यक है| अत: चरित्र की मर्यादा व सामाजिक संगठन भारतीय समाज के अभिन्न गुण होने चाहियें| मेरा दृढ़ विश्वास है कि इन गुणों द्वारा संगठित भारतीय नागरिक अपना व दूसरों का जीवन सुखमयी बना सकते हैं और देश को उन ऊँचाइयों पर ले जा सकते हैं जहां विश्व में भारत को उचित सम्मान मिल पाये| ऐसे वातावरण में भारतीय समाज नारी को उचित स्थान देने को तत्पर रहेगा|

के द्वारा:

के द्वारा: vinitashukla vinitashukla

आपने बड़े आशाजनक उदाहरण के माध्यम से अपना पक्ष रखने का प्रयास किया है कविवर । मैं भी तो अपने दम तोड़ते संस्कारों की पूँजी पर ही भरोसा व्यक्त कर पा रहा हूँ । हमारे संस्कार ही हैं जो कुम्भ तक ले जाते हैं । परन्तु एक सच्चाई यह भी है कि एक दो दशक बाद कुम्भ के महामेले वाली भीड़ रिटायर्ड होकर तेजी से छाते आज की युवा आबादी की ओर ही आशा भरी नज़रों से देख रही होगी, कि वे संस्कारों का झंडा ऊँचा उठाए रखें । क्या आपको लगता है कि यौनशिक्षा ग्रहण करने वाली पीढ़ी भी इस ग्राफ़ को बनाए रख पाएगी ? आज उसी मीडिया का वर्चस्व समाज पर हाबी है, जिसके कारण हम कुम्भ से संतों के बहुमूल्य प्रवचन का सीधा रसास्वादन कर पा रहे हैं, तथा माता वैष्णो की पवित्र पिंडियों का नित्यप्रति अपने घर में बैठे-बैठे ही दर्शन कर पा रहे हैं । देखना होगा कि भविष्य में भी बाज़ारवाद हमें यह अवसर सुलभ कराते रहता है, अथवा नहीं । जिनके ऊपर नैतिकता की शिक्षा-व्यवस्था का दारोम्मदार है, जब वही बे-ईमान बन चुके हैं, तो किसके सहारे हम उम्मीदों का दीप प्रज्वलित रख पाएंगे ?

के द्वारा:

आदरणीय विनीता जी एवं आदरणीय शाही जी, आप ने जो कहा है कि " नई पीढ़ी के लिये भी हम खुद अपने हाथों से स्वच्छंद और निरंकुश व्यवस्था गढ़ने को "लाचार" हैं, क्योंकि आज के समय की मांग ही ऐसी है ।" पर इस मांग को संवर्धित किसने किया है ? अंतर्राष्ट्रीय बाजारवाद के दलालों ने और हमारे मूर्ख-अदूरदर्शी राजनेताओं ने ! और बात जहां तक बहुत दूर निकल आने की है, तो अभी हमने कोई दूरी नहीं तय की है ! और तय भी की है तो वहाँ से वापस भी लौटा जा सकता है ! हमारा देश बहुत विशाल है और पाश्चात्य अघ्नंगी संस्कृति अभी उसे बहुत कम प्रभावित कर पाई है ! अगर ऐसा नहीं होता तो इस महाकुम्भ में एक ही दिन चार करोड़ लोगों की श्रद्धा उछालें न मारतीं ! सैकड़ों घायलों और कई मौतों के बाद भी इस श्रद्धा भावना की अनुगूंज समाप्त नहीं हुई ! अभी कोई नुक्सान नहीं हुआ है ! अभी भी हम चाहें तो स्थितियां काबू में आ सकती हैं, पर यह हमारे और आपके किये नहीं हो सकता, बल्कि इसके लिए सुदृढ़ इच्छा शक्ति वाला राजनैतिक परिवेश चाहिए !

के द्वारा: shashi bhushan shashi bhushan

आदरणीय शाही जी, वर्तमान परिप्रेक्ष्य में विखंडित होते हुए नैतिक चरित्र की, यहाँ आपने बहुत सुन्दर विवेचना की. आपने सही कहा कि नैतिकता और आदर्शों के हिमायती लोगों को दबाया कुचला जा रहा है. शिक्षा में पाठ्यक्रम, राजनैतिक आवश्यकताओं के अनुरूप तोड़ा मरोड़ा जा रहा है. कहने को तो हम अखंड भारत के नागरिक हैं पर हमारी सोच जाति, धर्म और क्षेत्रवाद के दायरों में बंटकर, वोट – बैंक के समीकरण निर्धारित करती है. ऐसे में हम बच्चों को किस आदर्श, किन मूल्यों की शिक्षा दे पाएंगे? आपने सही कहा कि हम बाजारवाद के षड्यंत्र में फंसकर इतने आगे निकल आये हैं जहां से लौट पाना संदेहास्पद है. आपके बहुमूल्य विचारों के लिए, हार्दिक आभार.

के द्वारा: vinitashukla vinitashukla

नैतिक शिक्षा ही इससे जुड़ी हर समस्या का समाधान है विनीता जी, और कोई उपाय नहीं है । एक दूसरे के भूखंडों पर समा चुकी दुनिया के मिश्रित संस्कारों से दामन बचाकर निकल पाना आज के दौर में किसी भी समाज के लिये संभव नहीं रह गया है । बाज़ारवाद हमारी रग-रग पर कब्ज़ा जमाता चला जा रहा है । पहले सादा जीवन उच्च विचार को आमतौर पर हर स्तर पर सम्मान प्राप्त होता था, जबकि आज का प्रमुख मापदंड व्यक्ति की जेब का वज़न और उसकी गाड़ी का माडल बन चुका है । नैतिकता की बात चर्चाओं में स्थान बनाती है, परन्तु व्यावहारिक रूप से लुप्तप्राय है । नई पीढ़ी को सही मार्ग दिखाने वाले विरले लोग प्रशासनिक स्तर पर बुरी तरह प्रताड़ित और उपेक्षित होते जा रहे हैं, क्योंकि सत्ता कोई भी हो, उसका चरित्र भ्रष्ट हो चुका है । शैक्षणिक सामग्री राजनीतिक आवश्यकताओं के आधार पर निर्धारित होने लगी है । ऐसे में आपसी मानवीय सम्बन्धों के बीच हम किसी मर्यादा की आशा करें भी तो कैसे ? सेक्स प्राकृतिक रूप से पाशविक आचरण ही है, जिसे मात्र मानव जाति द्वारा अपनी सामाजिक ज़रूरतों के आधार पर परिष्कृत कर मर्यादा के दायरे में ढाला गया है । वैज्ञानिक रूप से मानव सामाजिक 'पशु' ही तो है । नैतिकता का जैसे-जैसे विघटन हो रहा है, उसी अनुपात में समाज का भी विघटन हो रहा है, और प्रत्येक समूह अब एक भीड़ मात्र बनता जा रहा है । नई पीढ़ी के लिये भी हम खुद अपने हाथों से स्वच्छंद और निरंकुश व्यवस्था गढ़ने को लाचार हैं, क्योंकि आज के समय की मांग ही ऐसी है । मैं नैतिक शिक्षा की बात तो कर रहा हूँ, परन्तु खुद मुझे ही संदेह है कि इतनी दूर निकल आने के बाद हम लौटकर क्या समाज को वास्तव में ऐसी कोई शिक्षा व्यवस्था दे पाने में सक्षम भी हो पाएंगे ? ले-देकर हमारे पास अपने दम तोड़ते संस्कारों की पूँजी ही शेष है, जो कुछ उम्मीद जगा सकती है, शेष तो समय बड़ी तेज़ी से हमारे हाथ से फ़िसलता जा रहा है । आप शिक्षण क्षेत्र से जुड़ी विदुषी महिला हैं, अत: आपका आकलन ठीक ही होगा । धन्यवाद !

के द्वारा:

आदरणीय शाही जी, आपकी बात दुरुस्त है. कायदे से तो परिवार के भीतर ही ऐसी समस्याओं का समाधान होना चाहिए – इन बातों का ढोल पीटना अच्छा नहीं लगता; यही हमारी पारिवारिक, सामाजिक – मर्यादा का तकाज़ा भी है. किन्तु कुछ मामलों में हमारा परम्परावादी/conservative होना भारी पड जाता है. अभी भी परिवारों में ऐसी चर्चा करना बुरा माना जाता है. खासतौर पर बड़ों का सम्मान करने की जो बात सिखाई जाती है – उसमें यह सावधानी शामिल नहीं होती कि सभी बड़े सम्मान के काबिल नहीं होते. फलस्वरूप करीबी रिश्तेदारों, पारिवारिक मित्रों और परिचितों द्वारा बाल- शोषण का ख़तरा बना रहता है. हाल में ही ‘सावधान इंडिया’ नामक सीरियल में एक मेधावी बालक का पी. टी. टीचर द्वारा शोषण दिखाया जा रहा था; मामले को दबाने में मैथ्स टीचर का भी हाथ था. यह सब एक नामी स्कूल में हो रहा था. देखकर बहुत धक्का लगा. समझ नहीं आता कि ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए क्या किया जाये? क्या हमें अपने परम्परावादी खोल से बाहर निकलना होगा या फिर सरकार को ऐसे साहित्य/ फिल्मों को सुलभ कराना होगा; जिससे बच्चे बिना कहे सावधान हो सकें. हमारी सामाजिक परिस्थियां किशोरियों के लिए बहुत अच्छी नहीं हैं. उन्हें अक्सर बुरी निगाहों/ व्यवहार का सामना करना पड़ता है. ऐसी बातों का समाधान न होने पर वह कुंठा में बदल सकती है. चर्चा में अपने विचार रखने के लिए शुक्रिया.

के द्वारा: vinitashukla vinitashukla

अपने अभिप्राय को स्पष्ट करने के लिये मुझे बहस थोड़ी खींचनी पड़ रही है, क्षमा चाहूँगा । मैं कवि भूषण जी के उद्धरण का सहयोग लेते हुए उन्हें दोहराना भी चाहूँगा, कि 'सेक्स की जानकारी उम्र के साथ स्वत: प्राप्त होती जाती है' । जब यह एक प्राकृतिक आवश्यकता और प्रक्रिया दोनों ही श्रेणियों में आता है, तब फ़िर बच्चे हों या किशोर, कैसी कुंठा और क्या मार्गदर्शन ? सब कुछ तो आदिकाल से ही यूँ ही चला आ रहा है । प्रथम बार रजस्वला होने पर वय:संधि की बाला की स्वाभाविक घबराहट को क्या हम कुंठा की श्रेणी में रख दें ? ऐसी स्थिति में हर माता हमेशा से ही एक स्वाभाविक सखी की भूमिका निभाती आई है । क्या इसके लिये कभी स्कूली प्रशिक्षण की भी आवश्यकता महसूस की गई ? ऐसा ही प्रथम प्रसूता के साथ भी होता रहा है । जवानी की दहलीज़ पर खड़े जिज्ञासु बालक अपनी मंडली में ही चर्चा कर खुद ब खुद परिवर्तनों का सबब जान लेते हैं, आजतक कभी किसी को प्रशिक्षित करने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई, तो आज इतने विकसित और तथाकथित सभ्य समाज को ही इस शिक्षा की आवश्यकता क्यों महसूस होने लगी ? यदि मैं इसके पीछे विश्वव्यापी बाज़ारवाद के षड्यन्त्र की सम्भावनाओं पर चर्चा करने लगूँ, तो यह खिंचाई और लम्बी होती चली जाएगी । संक्षेप में कहना चाहूँगा कि भारतीय समाज कृपया कंडोम, वियाग्रा और गर्भनिरोधक बेचने वाले अन्तर्राष्ट्रीय गिरोह के झाँसों में आकर खुद को दूरगामी दुष्चक्र से दूर ही रखे तो अच्छा है । हमारे यहाँ यौन शिक्षा की कोई आवश्यकता नहीं है । यदि हमारे बच्चों को यौन-शिक्षा की आवश्यकता है, तो उनसे पूर्व हमारे पशु-पक्षियों को इस दिशा में प्रशिक्षित करना अधिक आवश्यक होगा, जिन्होंने कभी भी हमारी सामाजिक वर्जनाओं की कोई परवाह नहीं की । यह ऐसी क्रिया है, जो स्वत:स्फ़ूर्त निस्तारित होती है । बिना वजह इसपर जितनी माथापच्ची होगी, कुंठा निकलने के बजाय बढ़ती ही जाएगी । धन्यवाद !

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

आदरेया विनीता जी आपके इस आलेख में कई बातें ऐसी प्रतीत हो रही है जैसे रट्टा लगा रखा हो और कुछ बातें अव्यवहारिक सी प्रतीत हुई. कुछ कुछ बातों से आलेख कमजोर हुआ है. मैं इस बात से पूर्ण सहमत हूँ की यह तलवार की धार पर चलने वाला कृत्य सामान है किन्तु जब बच्चा मुश्किल में हो तब माताएं शेर से भी लड़ जाती हैं. तो इस धार पर चलने का समय आ गया है तो फिर डरने से भी काम नहीं चलेगा. आवश्यक है शाला में इसे शुरू करने के पहले बच्चों के अभिभावाको को लगातार कई कार्यशाला आयोजित कर विश्वास में लिया जाए ताकि वे भी घर में मदतगार साबित हों तभी इसे शालाओं में लागू किया जाए. मैंने आलेख पर जैसा महसूस किया वही लिखा है मेरा तनिक भी विचार आपको आहत करने का नहीं है. सादर.

के द्वारा: akraktale akraktale

आदरणीय शाही जी. प्रणाम. सर्वप्रथम तो मेरे प्रयास को सराहने हेतु धन्यवाद. जैसा कि मैंने कहा, छोटे बच्चों का इस विषय में मार्गदर्शन बेहद जरूरी है. किशोरों को भी दैहिक परिवर्तनों से कुंठा हो सकती है और उन्हें भी मार्गदर्शन की आवश्यकता पड़ सकती है. किन्तु मैं इसे पाठ्यक्रम में लागू करने के पक्ष में बिलकुल नहीं हूँ( अध्यापक और शिष्य के बीच संवाद की गरिमा बेहद जरूरी है) यह मैंने उदाहरणों द्वारा, सांकेतिक रूप में कहा भी. यह मार्गदर्शन अभिभावकों( किशोरियों हेतु बड़ी बहन या माँ के द्वारा) दिया जा सकता है. जरूरत पड़ने पर काउन्सलिंग भी मददगार हो सकती है. आपने सच कहा कि हम महिला ब्लॉगरों के लिए, अभिव्यक्ति की सीमायें है. ऐसे विषयों पर बहुत खुलेपन के साथ, हम अपने विचार नहीं रख सकतीं. फिर भी जागरूक नागरिक की नैतिक जिम्मेदारी हम पर है इसलिए सामाजिक सरोकारों के साथ कहीं न कहीं जुड़ना जरूरी होता है( भले ही अप्रत्यक्ष रूप में). रचना को समय देने के लिए पुनः धन्यवाद. सादर

के द्वारा: vinitashukla vinitashukla

श्रद्धेया विनीता जी, आपने वस्तु-स्थिति के सापेक्ष अपेक्षित आचरण का बिन्दुवार विश्लेषण करने का अच्छा प्रयास किया है, परन्तु यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि आप यौन-शिक्षा की कितनी हिमायती हैं, अथवा नहीं हैं । सांकेतिक रूप से आपने अपना मंतव्य ज़ाहिर किया है कि हमारे संस्कार हमारे यहाँ यौन शिक्षा को आसान नहीं बनने देंगे । यही सही भी है । उदाहरण-स्वरूप कहना चाहूँगा, कि इस मंच पर प्राय: सभी महिला ब्लागर अच्छे पढ़े-लिखे एवं आधुनिक परिवेश में रहने वाले परिवारों से ताल्लुक़ रखती हैं, परन्तु अमूमन यहाँ सेक्स जैसे विषय पर किसी भी स्तर की चर्चा करने की प्रवृत्ति शायद ही अबतक किसी महिला में देखी गई हो । मैं छद्मवेशी महिलाओं की बात नहीं कर रहा हूँ । जबकि यदि यही साइट पश्चिमी समाज की होती, तो खुली बहस देखी जा सकती थी । हमारे यहाँ सेक्स-एजूकेशन से अधिक आवश्यकता नैतिक शिक्षा की है, ताक़ि हमारी पीढ़ियाँ संचार-माध्यमों द्वारा लाई गई अप-सांस्कृतिक प्रवृत्तियों पर विजय पाने में सक्षम हो सकें । धन्यवाद !

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

आदरणीया विनीता शुक्ला जी, आप ने चर्चित विषय पर व्यापक चिंतन का संक्षिप्त-संतुलित निबंध प्रस्तुत किया है, पढ़कर बहुत अच्छा लगा; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! नव वर्ष की मंगलकामनाएँ ! "आर्थिक वर्गीकरण की रौशनी में यदि, चारित्रिक पतन की व्याख्या करें तो पायेंगे कि उच्च वर्ग और निम्न वर्ग में, इसकी संभावनाएं ज्यादा हैं। कारण- वर्जनाओं का अभाव। उच्च वर्गीय स्त्री व पुरुष धन के मद में, कुछ भी स्याह सफेद करते फिरें- किसी की हिम्मत नहीं जो उन पर उंगली उठा सके। पैसे की ताकत होती ही कुछ ऐसी है! वहीं दूसरी तरफ निम्नवर्ग में, पैसों की कमी के चलते, देह- व्यापार मजबूरी के तहत किया जाता है। स्त्रियाँ यह सब, अपने परिवारजनों ( पति , बच्चों आदि ) की जानकारी में करती हैं। इस तरह के माहौल में पले बढे बच्चों को, वर्जनाओं को लेकर कोई डर या अपराध- बोध नहीं रह जाता। यहाँ तक कि निर्धनता व भावनात्मक असुरक्षा के चलते, वह भी यौन- शोषण का आसानी से शिकार हो सकते हैं। फलस्वरूप यौन- कुंठा और यौन विकृति, उनके वजूद में पनपने लगती है .ऐसे बच्चे जब बालिग़ होते हैं तो उनसे ये उम्मीद कतई नहीं की जा सकती- कि समाज में रहकर, वे आचरण के मानदंडों को निभायेंगे। दामिनी का सर्वनाश करने वाले युवक भी, निम्न वर्ग से ही सम्बंधित थे। रही बात मध्यम वर्ग की तो – संस्कार और पाबंदियों को मानने वाला तबका यही हुआ करता था। किन्तु बढ़ती मंहगाई ने, गृहणियों को काम काजी औरतों में तब्दील कर दिया है। अब उनके पास बच्चों को संस्कार सिखाने, उन्हें प्यार- दुलार देने का समय ही नहीं। उस पर पाश्चात्य संस्कृति और मीडिया का प्रभाव अलग से।"

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

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के द्वारा: vinitashukla vinitashukla

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मुनीश जी, इस आलेख का उद्देश्य अच्छी और बुरी वर्जनाओं पर प्रकाश डालना था. अंतिम पैरा में मैंने लिखा भी है, "स्त्रियाँ कोमलांगी होती है- अतः यह उनके लिए, कहीं न कहीं जरूरी भी हैं. वर्जनाओं के अतिक्रमण का दुष्प्रभाव, विदेशी जीवन- शैली में देखा जा सकता है. इस प्रकार जो वर्जनाएं, मर्यादा का पालन करना सिखाएं- अच्छी हैं. आज की युवा पीढ़ी को यह समझने की, बहुत जरूरत है." इन चंद पंक्तियों में ही मेरा मन्तव्य स्पष्ट हो गया है. वैसे भी, विस्तारपूर्वक चर्चा , सम्भव नहीं. पूनम पांडे और शर्लिन चोपडा सरीखी औरतों के बारे में क्या और कैसे कहा जाय? मीडिया पर अंकुश लगाना भी जरूरी है- लेकिन इस पर बात करना विषय से भटकने जैसा होगा. आपकी विचारशील प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद.

के द्वारा: vinitashukla vinitashukla

के द्वारा: vinitashukla vinitashukla

आदरणीय विनीता जी , बेस्ट ब्लोगर बनाने के लिए आपको बधाई, अंतिम पहरे में आपने लेख को एकतरफा होने से बचा लिया, दिल्ली वाली गैंगरेप की घटना के बाद से जागरण जंक्शन पर बहुत से विद्वान ब्लोगरों के विचार पढने को मिले और निश्चित ही विचार तो सराहनीय हैं ही ........! लेकिन उक्त घटना से पूर्व आदरणीय सरिता जी ने एक लेख लिखा था "निकलो न बेनका" शायद आपने भी पढ़ा हो ........ मेरा मानना है की हर एक को अपने विचारों के साथ उस लेख को साथ रख कर विचार करने की आवश्यकता है शायद कुछ समाधान निकल सके ....... और उक्त विषय पर सभी लेख जो इस समय सामयिक भी लग रहे हैं परन्तु अपूर्ण से भी हैं को पूर्णता मिल सके .... हालांकि आपके लेख पर आदरणीय राकेश जी ने अपने विचार रखे हैं जिनसे असहमत नहीं हुआ जा सकता और आपका लेख भी जो कहीं कहीं एकतरफा सा लगता है या पूर्णता को खोजता सा लगता है को बल मिला है फिर भी यही कहूँगा की बहुत अच्छा लिखा है, आदरणीय सरिता जी के लेख का लिंक दे रहा हूँ यदि आपने न पढ़ा हो तो अवश्य निगाह डालें http://sinsera.jagranjunction.com/2012/11/10/%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A5%8B-%E0%A4%A8-%E0%A4%AC%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A4%95%E0%A4%BC%E0%A4%BE%E0%A4%AC/

के द्वारा: munish munish

के द्वारा:

आदरणीया विनीता जी बधाई हो बेस्ट ब्लॉगर आफ दी वीक के लिए ...सुन्दर सार्थक लेख ..... हमारे समाज में स्त्री पर पाबंदियाँ लगाना और उसके पंख कतरना एक सहज प्रवृत्ति है. जब चाहे उसे ‘रौंद’ देना भी, इस घृणित मानसिकता का ही हिस्सा है. मेरा दावा है कि जो लड़का अपने परिवार में, पिता द्वारा, माँ/ बहनों का सम्मान होते हुए देखता हो. जिसने बालपन से माँ, बहनों का स्नेह पाया हो; शिक्षित, शक्तिरूपा माता द्वारा संस्कार और मार्गदर्शन पाया हो- वह कभी व्यभिचारी हो ही नहीं सकता. इन पंक्तियों ने मन को छू लिया सार है ये ....संस्कार बहुत जरुरी है बच्चे को सब कुछ दिया गया संस्कार नहीं दिया गया वो अधूरा ही रहेगा चाहे धन के तालाब में वो डुबकी लगाता रहे ....वर्जनाएं बुरी नहीं होती बहुत जरुरी हैं स्वतंत्रता जैसे जरुरी है सामंजस्य रख कर चलना होता है ...काश लोग सोचें समझें और करें तो आनंद और आये भ्रमर ५

के द्वारा:

के द्वारा: vinitashukla vinitashukla

देश की आधी आबादी को जरुरी मानसिक पोषण नहीं मिला …इसी मानसिक कुपोषण की वजह से शायद आज की सांवली स्त्री /लड़की स्वयं को कुरूप और कुरूपता को सबसे बड़ा अभिशाप मानती है और गोरे रंग को सबसे बड़ा हथियार मानती हैं… पश्चिमी मीडिया ने ”फेयर न लवली ” को सबसे बड़े वरदान के तौर पर पेश किया है …. इससे आम (गरीब ) भारतीय लड़कियों (जो आर्थिक तौर पर उतनी समृद्ध नहीं हैं की रूप सज्जा पर अनाप -शनाप खर्च कर सके ) में हीन भावना को बाल मिला है … देश में महिला विदुशियाँ उँगलियों पर गिनी जा सकती हैं लेकिन बॉलीवुड , टोलीवुड , भोजीवुड .. और दूरदर्शन के कितने ही प्रायोजित कार्यक्रमों में निहायत चमचमाती हुई सैकड़ों लड़कियों को देखा जा सकता है … क्या यही वास्तविक महिला सशक्तिकरण है ? आर्थिक उदारीकरण के बाद स्थिति “कोढ़ में खाज ” वाली हो चली है … कंडोम और आई -पिल्स के विज्ञापन तो देश की हर सड़क , चौराहे और मेडिकल स्टोर पर तंग गए हैं , साइबर युद्ध, इन्टरनेट पोर्नोग्राफी , सिनेमा और दूरदर्शन की सेंसरशिप को विदेशी चश्मे से देखा जाने लगा है और कभी -कभी तो नग्नता न दिखा पाने को स्वतंत्र अभिव्यक्ति का हनन तक करार दिया जाने लगा है एक सम्मानित पर्त्रिका तहलका ने नग्नता की इच्छा जताने वाली एक अभिनेत्री (पूनम पाण्डेय ) का महिमामंडन कुछ इसी प्रकार से किया है…. क्या यह नग्नता नारी आज़ादी का प्रतिक बनने वाली है? आज भारतीय सामाजिकता के अधकचरे ज्ञान ने भारतीय मानस को इस कदर भ्रम में डाल दिया है कि सही क्या है वो उसे दकियानूसी मानने लगा है और जो गलत है वह प्रेरक लगने लगा है .. इन्ही प्रभावों के चलते आज वेश्यावृत्ति कि वैधानिकता के लिए दर्जनों समूह झंडा लिए घूमते हैं . क्या वे भारतीय सन्दर्भ में वेश्यावृत्ति के आर्थिक सामाजिक स्वरुप के भारतीय जनमानस पर होने वाले प्रभाव के बारे में कोई अध्ययन या विशेषज्ञता रखते हैं .. शायद नहीं! या नाम मात्र … हमारे अतुल्य भारत में हमने ही दुनिया में सबसे पहले “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते , रमन्ते तत्र देवता ” का सिद्धांत दिया “दुर्गा सप्तशती ” के रूप में हमने सर्वशक्तिमान नारी की आराधना शुरू की और आज भी करते हैं . लेकिन यह सोचने का विषय है की आधी आबादी के लिए बने उद्देश्य सिर्फ मूर्तिपूजा तक क्यों सिमट गए ? मानवीय त्रिगुनो (रज , सत और तम ) में देश काल और परिस्थितियों में जो प्रधान हो उसी का प्रतिरूपण सामाजिक दशा को प्रदर्शित करता है . ये त्रिगुण आर्थिक-सामाजिक कारकों से प्रेरित या प्रभावित होते हैं (आधुनिक मनोविज्ञान में प्रेरण और उद्दीपन का सिद्धांत )…अंग्रेजों के मानसपुत्रों द्वारा लिखा इतिहास भारतीय संस्कृति को नारी-शक्ति का सबसे बड़ा दुश्मन बताता है. देवदासी प्रथा , सती -प्रथा , बाल -विवाह जैसे अत्याचारी कुप्रथाएं होने के पीछे क्या तर्क देता है … इन तर्कों पर विश्वास करके हम अपनी सांस्कृतिक विरासत का अवमूल्यन करते चले आ रहे हैं .. जिस देश की आत्मा ही स्त्री को सर्वशक्तिमान इश्वर स्वरुप मानती रही हो … यदि आज वो देश इस दशा में पहुँच जाये तो यह मनुष्य की प्राकृतिक स्वाभाव और देश की चेतना किसी के अनुरूप नहीं है … हम जिन मूल्यों को दकियानूसी मानते हैं उसी की उपेक्षा से ये परिस्थितियां पैदा हुई हैं … आधी आबादी के साथ हो रहा अत्याचार ” अत्यधिक चिंतनीय हैं ..यदि आप भारतीय सन्दर्भ में इसके मूल कारकों की खोज करना चाहते हैं तो आपको भारतीय मूल्यों के ऐतिहासिक उन्नयन और उस पर विदेशी आक्रमणों के प्रभाव का अध्ययन करना ही होगा. वहीँ पर इसका मूल निहित है और वहीँ पर समाधान भी.800 सालों से चल रहे विदेशी आक्रमणों और षड्यंत्रों के प्रभाव से शिक्षा और समाज दोनों अलग -अलग रास्तों पर जा रहे हैं … और सामाजिक सक्रियता ख़त्म हो गयी है … जब मुख्यधारा में विदेशी प्रभाव इस कदर होंगे तो मुख्यधारा की दशा और उसमे व्यक्ति का अस्तित्व नगण्य हो जाता है … … देश की सांस्कृतिक विरासत ने काम (सेक्स … वात्सायन का कामसूत्र ) और प्रेम के जो सिद्धांत दिए हैं उनको आप दकियानूसी मन लेते हैं तो फिर आप दोष किसे देते हैं … भारतीय इतिहास में प्रेम कभी अपराध नहीं रहा है (इसका एक विभ्रंश रूप ’ऑनर किल्लिंग ’ है लेकिन इसके किसी विरोधी ने जहमत नहीं उठाई की यह क्या है और क्यों हुआ ? ) शायद ऐतिहासिक विवेचन और मानव व्यव्हार के अध्ययन से इसके विरोध कि शुरुआत होनी चाहिए थी…. . कानून तो बहुत हैं लेकिन सवाल यह हैं कि आप किसी व्यक्ति के मन पर कौन से कानून से नियंत्रण कीजियेगा ..? मन पर नियंत्रण मूल्य आधारित शिक्षा से होगा , उन कारकों के वैज्ञानिक विश्लेषण से होगा जिनको आप दकियानूसी मान के छोड़ देना चाहते हैं .. हामारी करोड़ों वर्ष पुरानी सभ्यता में कभी नारी -शक्ति के साथ अत्याचार नहीं हुए … इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो इसके लिए निम्नलिखित सुझाव हैं .. 1. आज की सामाजिक दुर्दशा गुलामी एवं पश्चिमी प्रभावों की देन है .. देश की मूल सांस्कृतिक विरासत को शिक्षा में समाहित किया जाये .. 2. स्थानीय प्रशासन का सशक्तिकरण करके ऐसी घटनाओं में पीडिता को त्वरित न्याय दे सकने में समर्थ बनाया जाये . FIR दर्ज करना प्रशासन के नैतिक कर्तव्यों के साथ सेरविसे रूल बुक में लीगल तौर पर शामिल किया जाये . ताकि पीडिता को दर -दर भटकना न पड़े . 3. पीडिता के मनोपचार और पुनर्वास हेतु विशेषज्ञों का एक स्वतंत्र पैनेल (जिसमे कम से कम एक डॉक्टर, मनोवैज्ञानिक, अपराध विज्ञानं विशेषज्ञ,परामर्श विद. न्यायिक कार्याधिकारी , पुलिस का प्रतिनिधि , मीडिया प्रतिनिधि, और स्थानीय जनप्रतिनिधि शामिल हों. ) हर स्थानीय प्रशासन की इकाई में शामिल किया जाये ताकि न्याय में देरी और न्यायिक प्रक्रिया में पीडिता हताशा का शिकार न हो . न्याय में देरी न्याय न मिलने के बराबर है. 4. बाल -मष्तिष्क पर अभद्र दूरदर्शन कार्यक्रमों का असर ऐसी घटनाओं के लिए नकारात्मक प्रेरण की भूमिका निभाता है .. इसके लिए कार्यक्रमों को आयु समूह के अनुसार प्रदर्शित किया जाये . 5. महिलाओं के साथ सद्व्यवहार करने वाले कर्मचारियों को समयांतर में सम्मानित करने से समरसता को बढ़ावा मिलेगा . 6. सामान्य स्थानों (पार्क , रेस्टोरेंट इत्यादि .) में हो रहे प्रेमालाप से जन मानस पर सदैव नकारात्मक प्रभाव होता रहा है . इसे सख्ती से रोका जाये . इस प्रकार के प्रयास से ऐसे स्थानों पर होने वाली छेड़ -छड की घटनाओं पर निश्चित रूप से अंकुश लगाना संभव होगा . 7. स्थानीय प्रशासन में सामाजिकी और मानविकी के विशेषज्ञों का स्थायी तौर पर स्वतंत्र नियुक्ति हो ताकि उनके सहयोग से ऐसी घटनाओं के की समीक्षा एवं पारिस्थितिकीय कारकों को खोज कर उसकी पुनरावृत्ति रोकी जा सके . 8. स्थानीय प्रशासन को पीडिता के परिवार की यथासंभव मदद मानवीय सन्दर्भों में करनी चाहिए , शासन से अपेक्षा है की वह सर्वश्रेष्ठ चिकित्सकीय सुविधा से पुनर्वास तक का जिम्मा उठाये . 9. प्रेम प्रसंगों या विवाहोपरांत इस प्रकार की घटनाओं को काउंसिलिंग या परिवार न्यायालय के स्तर से सुलझाने का प्रयास सराहनीय होगा . स्थितियां गंभीर हों तो सामान्य न्याय प्रक्रिया उचित हो सकती है . 10. बदले की भावना में लगाये गए आरोपों , शासन प्रणाली के सदस्यों , डॉक्टरों और न्यायाधिकरण के सम्मानित सदस्यों द्वारा किये गए संदर्भित अपराधों को एक श्रेणी में रख के सख्त से सख्त सजा दी जाये . 12. सभी घटना पत्रों को व्यवस्थित और लिपिबद्ध करके स्वतंत्र पुनर्विवेचन के लिए सर्व सुलभ किया जाये .

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जो पुरुष अपने बचपन में माँ को, सदा पिता से प्रताड़ित होते हुए देखता रहा हो; अपनी अशिक्षित बहनों के साथ होने वाले, सौतेले व्यवहार का साक्षी रहा हो- उसके अवचेतन में नारी की छवि एक दोयम दर्जे के प्राणी की ही होगी। ऐसा व्यक्ति क्या नारी का सम्मान कर सकेगा? इसी मानसिकता के चलते नारी, शैशव में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में बेटे के दुर्व्यवहार का शिकार होती रही। क्या घर से बाहर कदम न रखने पर, उसकी सुरक्षा सुनिश्चित हो सकी? निकट सम्बन्धियों, ससुर, जेठ आदि के द्वारा उसकी अस्मत पर हमले होते रहे। सुश्री आशापूर्णा देवी के कालजयी उपन्यास, ‘प्रथम प्रतिश्रुति’ की नायिका के दर्द से, पाठक अनभिज्ञ नहीं हैं। सुश्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कथा ‘मंझली रानी’ की नायिका निर्दोष होते हुए भी, जेठानी और समाज द्वारा ‘कुलटा’ ठहरा दी जाती है. बाल- विवाह और अशिक्षा का एक सुन्दर उदाहरण इस कहानी से मिलता है. सभी पुरुष एक से नहीं होते। शिक्षित माता के सान्निद्य में पला- बढ़ा पुरुष, जिसने अपनी माता से भावनात्मक सुरक्षा और संस्कार पाए हों – नितांत विपरीत सोच रखता है। एक गंभीर विषय पर सार्थक लेखन दिया है आपने ! लेकिन इस बात से पूर्ण सहमती शायद नहीं बन सकती क्यूंकि ऐसे भी केस देखे हैं जहां भरे पूरे परिवार में परवरिश पाने वालों ने भी उस परिवार पर दाग लगाया है !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

अत्यंत संवेदनशील विषय पर आपने बहुत अच्छा लिखा है,. यदि हर स्त्री को, लोगों का नैतिक समर्थन मिलता रहे तो अपराधी अवश्य डरेंगे। स्त्री आज भी वर्जनाओं में जकड़ी हुई है. इसमें कुछ अच्छी और कुछ बुरी और अनावश्यक हैं. हमारा समाज पतनोन्मुख है. अराजकता और अनैतिकता का माहौल है. कुछ वर्जनाएं स्त्री की सुरक्षामें सहायक साबित हो सकती हैं. इस समस्या का हमें दो स्तरों पर सामना करना पड़ेगा. एक तो हमें अपने बेटों को ऐसे संस्कार देने होंगे कि वे अपनी बहनों और सभी स्त्रियों की इज्ज़त करना सीखें. दूसरे ऐसे कानून की नितांत आवश्यकता है कि अपराधी ऐसे घृणित जघन्य अपराध के बारे में सोचने की भी हिम्मत न कर सके. एक बात मैं आपके साथ शेयर करना चाहता हूँ कि मैं एक वैज्ञानिक संस्थान से सेवा निवृत्त हुआ. जहाँ भारी संख्या में उच्च वैज्ञानिक शिक्षा( MSc , PhD ) प्राप्त लड़कियां कार्यरत हैं. वहाँ लड़कियों और लड़कों में में बड़े अच्छे पारस्परिक सम्मानजनक सम्बन्ध हैं. आप शायद यकीन न करें. मुझे कोई भी आपत्तिजनक बात कभी सुनने को नहीं मिली. आपने जो घटना बताई है वह भी संभव है. यह निर्भर करता है शिक्षा के स्तर और पारिवारिक पृष्ठभूमि पर. माहौल बदल रहा है. मुझे यह जानकार ख़ुशी हो रही है की आप जैसी महिलायें जागरूक हैं. मेरे अन्दर आशा का संचार हुआ है. आगे चलकर कुछ अच्छा ही होगा. एक अच्छे लेख के लिए बहुत बहुत बधाई.

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के द्वारा: vinitashukla vinitashukla

आदरणीया विनीता शुक्ला जी, नैतिक-सांस्कृतिक अधोपतन पर अत्यंत विचारणीय, पठनीय प्रस्तुति, हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! "वर्जनाएं सदैव बुरी हों ऐसा नहीं है. स्त्रियाँ कोमलांगी होती है- अतः यह उनके लिए, कहीं न कहीं जरूरी भी हैं. वर्जनाओं के अतिक्रमण का दुष्प्रभाव, विदेशी जीवन- शैली में देखा जा सकता है. इस प्रकार जो वर्जनाएं, मर्यादा का पालन करना सिखाएं- अच्छी हैं. आज की युवा पीढ़ी को यह समझने की, बहुत जरूरत है. उच्चवर्ग और निम्नवर्ग- जहां वर्जनाओं का महत्व कमतर है; स्त्रियाँ व पुरुष दोनों ही, आचरणविहीन हो सकते हैं. लेकिन वर्जनाओं को, अन्यायपूर्ण और गलत तरीके से लागू करना भी ठीक नहीं."

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

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के द्वारा: जैनित कुमार वर्मा जैनित कुमार वर्मा

निशा जी, कदाचित आप ‘वेळी’ और ‘सम्बन्धम’ की बात कर रही हैं. ‘वेळी’ अर्थात ‘वैध विवाह’ जबकि ‘सम्बन्धम’ मात्र विवाह की एक वैकल्पिक व्यवस्था थी. ‘वेळी’ की अनुमति (नम्बूदरी सम्प्रदाय में) परिवार के बड़े बेटे को ही होती थी. यह संबंध अपनी जाति की कन्या से ही जोड़ा जाता था. इस बंधन में बंधकर, पुरुष अपनी सहचरी व उससे उत्पन्न संतान के पालन- पोषण व उनके हितों की रक्षा की लिए उत्तरदायी होता था. दैहिक क्षुधा को शांत करने हेतु नम्बूदरी परिवार के अन्य पुत्र, नायर व अन्य निचली जाति की युवतियों के साथ ‘सम्बन्धम’ के तहत संबंध बना लेते. इसमें वह अपनी सहचरी या अपनी संतान के प्रति किसी भी प्रकार के दायित्व से मुक्त होते थे.( वह अपने पिता के घर ही रहती. उसे अपने सहचर के निवास पर जाने की अनुमति नहीं थी.) इस ‘अनुबंध’ को सामान्य अनुष्ठान द्वारा समाप्त किया जा सकता था और उस स्त्री से फिर उनका कोई वास्ता न रहता. उस कन्या को वे अपने घर नहीं ले जा सकते थे. यहाँ तक कि उसके साथ समय बिताने के बाद, वे अपना ‘शुद्धिकरण’ करते और तभी अपने घर जा सकते थे. इस प्रकार वे अनेक स्त्रियों से सम्बन्ध बना लेते. यहाँ तक कि कमसिन बालाओं का शोषण, अनाकर्षक वृद्ध कर लेते. उन कन्याओं के अभिभावक इसे ‘ईश्वरीय वरदान’ मानकर, सहर्ष इसकी अनुमति दे देते. इधर नम्बूदरी युवतियों की स्थिति भी कुछ ठीक न थी. उनके लिए वरों की भारी कमी थी(नम्बूदरी परिवारों में बस बड़े बेटे को ही विवाह की अनुमति होने के कारण). उन्हें प्रायः ‘वेळी’ के तहत एक ऐसे वृद्ध पुरुष से ब्याह करना पड़ता, जिसके पहले भी कई विवाह हो चुके हों, या फिर उम्र भर कुँवारी रहना पड़ता. ये पुरुष तो कई बार विवाह कर लेते पर इनकी स्त्रियों को सिर्फ एक बार विवाह की अनुमति थी.

के द्वारा: vinitashukla vinitashukla

आदरणीय विनीता जी, सादर नमस्कार। बहुत ही गंभीर विषय पर जानकारी देता हुआ सराहनीय आलेख। हमारे समाज का घृणित काला चेहरा दिखाता हुआ आलेख। कुछ विद्वान लोंगो ने अपना विलासता के लिये समाज के लिये बहुत से अमानवीय नियम बना दिये और उन्हें धर्म का नाम दे दिया जिससे किसी का विरोध करने का साहस न हो। यदि कोई इनका विरोध करने का साहस करता है तो उसे तरह तरह से प्रताडित करते है। अपमानित करते हैं, तरह तरह की गालियों से अलंकृत करते हैं, विदेशी ऐजन्ट  करार देते हैं, आतंकवादी कह देते हैं। यहाँ तो उन्हें जानसे मारने का फतवा भी जारी कर देते हैं। लेकिन हमें इनकी धमकियों से न डर कर ऐसी कुप्रथाओं का विरोध करना चाहिये। http://dineshaastik.jagranjunction.com/2012/08/21/ज्योतिषी-जी-एवं-ओझा-जी-की-प/

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

विनीता जी सादर नमस्कार, आपने एक नयी जानकारी दी है यहाँ मंच पर दक्षिण भारत के कम ही लोग हैं इसलिए वहाँ के रीती रिवाज कि अधिक जानकारी नहीं मिल पाती. हाँ केरल सर्वप्रथम सम्पूर्ण साक्षर प्रदेशों में गिना जाता है और देश का एक मात्र प्रदेश जों कन्या बहुल है.दक्षिण से देवदासी प्रथा के बारे में तो कुछ जानकारी थी किन्तु नम्बूदरी और नायर वाली जानकारी नहीं थी. अवश्य ही जब कभी इस परम्परा कि शुरुआत हुई होगी तो कुछ इसका उद्देश्य रहा होगा किन्तु कालांतर में जों घृणित रूप इसका आपने वर्णित किया है वह कदापि ठीक नहीं कहा जा सकता. मेघालय के बारे में भी आपने लिखा है. स्थिति वहाँ भी ठीक नहीं है किन्तु इसके कारण हम मात्सत्तात्मकता को असफल कहें यह ठीक नहीं है. इसके कुछ अच्छे परिणाम भी हैं जैसे लडकी भूर्ण कि ह्त्या जैसे अपराध ना होना. आपने एक नए और अच्छे विषय पर बहुत अच्छा लिखा है. आपका हार्दिक अभिवादन.

के द्वारा: akraktale akraktale

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के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

विनीता जी , नमस्ते ,जयशंकर प्रसाद .....महाकाव्य कामायनी.... में लिखते हैं - मुश्किलें दिल के इरादे आजमाती हैं स्वप्न के पर्दे निगाहों से हटाती हैं ... हौंसला मत हार गिर कर ओ मुसाफिर ठोकरे इंसान को चलना सिखाती हैं .. खोखली बातों से परिवर्तन सच में नही आता ,ठोस कार्य करने से पक्का परिवर्तन आयेंगा - तूफानों की हमे फ़िक्र नही ... रास्ते हम खुद बनाते हैं ... खुद पर हैं यकीं इतना ... मंजिल को हम पास बुलाते हैं ..... कभी कभार परिवर्तन लाने के लिए संघर्ष भी करना पडता हैं समर में घाव खाता हैं .. उसीका मान होता हैं .. छिपी उस वेदना में ........... अमर् वरदान होता हैं .... सृजन में चोट खाता हैं ... छेनी और हथोरी से वही पाषाण कही मंदिर में .. भगवान होता हैं........ http://avchetnmn.jagranjunction.com/2012/07/02/आधुनिक-शिक्षा-का-यह-रूप-भी/

के द्वारा: ajaykr ajaykr

दिनेश जी, आम आदमी एक भरमाई हुई भेड़ की तरह है; मक्कार नेता उसे बहला- फुसलाकर, कब उसकी सोच को हांक ले जाते हैं; पता ही नहीं चलता. वोट की राजनीति के लिए वह धर्म, जाति, सम्प्रदाय आदि कितने ही खेमों में बाँट दिया गया है - इस कारण संगठित होकर सड़ी हुई व्यवस्था से लड़ पाना उसके लिए अत्यंत दुष्कर है. नोन, तेल, लकड़ी के पचड़ों में वह इस तरह उलझा है कि बदलाव की बातें उसे सुहाती नहीं; न ही उसके पास समय है, इन झमेलों में पड़ने का. उसकी इच्छा शक्ति कमजोर है, वह क्रांति के लिए किसी नेतृत्व की प्रतीक्षा करता है - स्वयं समाज के चेहरे को बदल पाने का माद्दा नहीं रखता. मैंने तो बस एक जमीनी हकीक़त बयान की है; और कुछ नहीं. आपका सकारात्मक रुख सराहनीय है. धन्यवाद.

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जवाहर जी इस संदर्भ में मैं अपनी तरफ से कुछ नहीं कहूंगी. बस अपनी कविता का मंतव्य स्पष्ट करने हेतु एक दूसरी कविता का उदाहरण दूंगी जो सुश्री दिव्या शुक्ला द्वारा रचित है क्या स्त्री परजीवी है ?? -------------------------------- न जाने क्यूं ----- बार बार ये प्रश्न गूंजता है मन में ---- स्त्री का अपना घर कौन सा है ??? मायका या ससुराल ???? ... सोचो आज अगर पिता से लड़की अपना घर मांग ले तो ? उसका मायका छूट जायेगा न खून के रिश्ते अगर बेरहम नहीं होंगे ---- फिर भी खटास तो आ ही जायेगी ---- किसी स्त्री का अपना घर कहाँ होता है ---- पिता का घर ----पति का घर ---बेटे का घर -- परजीवी हुई न -----और क्या नाम दूँ --- हँसी आती है कभी कभी यह सोच कर स्त्री की न कोई जाति है न धर्म वो सब पुरुष का दिया ------------- कहीं देवी बना दिया कहीं दासी कहीं कुलीन परिवार के ऐश्वर्य में मिस्र की ममी की भांति सज्जित हो उनके गुण दोष छुपा कर घुट घुट कर मरती है तो कोई दासी बन कर खटती है ----- आध्यात्म या आत्महत्या ------- दोनों ही एक सहज साधन है इन से मुक्ति का और कोई रास्ता नहीं अगर ये रास्ता नहीं अपनाया फिर -------- तो यही से शुरू होता है उसका संघर्ष -------- सच ही तो कहा मैने ---------------------- स्त्री परिवार की इज्जत कहलाती है पर परिवार पुरुष का ही कहलाता है कर्तव्य तो है उसके पर अधिकार नहीं बहुत से ऐसे पति पत्नी भी होते है प्रेम नहीं है आपस में पर ----- रिश्ते निभाने है ---------- पर बिना प्रेम के रिश्ते क्या होते है मुझे समझ में नहीं आता इनको क्या कहते है ---------------- कोई बता सकता है क्या ??-------- मुझे तो लगता है मन का सब खेल है मन मिला तो मेला ----- वरना सब से भला अकेला ---- अगर प्रेम भी नहीं तो क्या रह गया फिर ---- माना तुम आसमान हो ------------------ तो हम भी जमीन है -------------- दोनों ही एक दूसरे के बगैर अधूरे --------- फिर तुम्हारा अहम क्यों आड़े आता है ------ अगर सीमा रेखायें स्वार्थ और अधिकार के लिये खींची हो --------तो उनके पार जाना पाप नहीं -..........................

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